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संगम युग - मेन्स

संगम युग (300 ईसा पूर्व - 300 ई.) प्राचीन दक्षिण भारत में तमिल साहित्य, संस्कृति और राजनीतिक संस्थाओं के उत्कर्ष का काल है।

तीन संगम

साहित्यिक अकादमियां

पांड्य राजाओं द्वारा स्थापित:

संगमस्थानबची रचनाएं
प्रथम संगममदुरैकोई नहीं बची (देवताओं और किंवदंती ऋषियों ने भाग लिया)
द्वितीय संगमकपाटपुरमकेवल तोलकाप्पियम (प्राचीन तमिल व्याकरण) बची
तृतीय संगममदुरैकई तमिल साहित्यिक रचनाएं बचीं
संगम साहित्य - विद्वान विश्लेषण (उपिंदर सिंह)

"संगम काव्य तमिल भाषा का सबसे पुराना बचा साहित्य है"

ऐतिहासिकता बहस:

  • 'संगम साहित्य' शब्द तीन साहित्यिक अकादमियों की बाद की परंपरा पर आधारित
  • इन अकादमियों की ऐतिहासिकता निश्चित नहीं है

संगम संग्रह में शामिल:

  • एट्टुतोकै के आठ संकलनों में से छह
  • पट्टुप्पात्तु के दस पट्टु (गीतों) में से नौ
  • तोलकाप्पियम की पहली दो पुस्तकों के प्रारंभिक भाग

दो प्रकार की कविताएं:

प्रकारशैलीविषय-वस्तु
अकमप्रेम कविताएंआंतरिक भावनाएं, रोमांटिक संबंध
पुरमवीरगाथा कविताएंयुद्ध, राजा, वीरता, बाहरी दुनिया

कवियों की पृष्ठभूमि:

  • कवियों की विविध सामाजिक पृष्ठभूमि थी
  • पूर्व समय के विनम्र गायकों और ढोलकियों के गीतों पर आधारित

कालक्रम:

  • तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व से तीसरी शताब्दी ई. = संगम साहित्य का काल

प्रमुख विद्वान: आर. चम्पकलक्ष्मी (1975-76) 'संगम युग' को महापाषाण संस्कृति के अंतिम चरण और दक्षिण भारत के प्रारंभिक ऐतिहासिक काल से पहचानती हैं

राजनीतिक व्यवस्था

तीन राजवंश

तमिल देश पर तीन राजवंशों का शासन:

राजवंशक्षेत्रराजधानीचिह्न
चोलउपजाऊ कावेरी बेसिनउरैयूर (तिरुचिरापल्ली)बाघ
पांड्यतटीय और चारागाह क्षेत्रमदुरैमछली
चेरपश्चिम में पहाड़ी क्षेत्रवांजि (करूर)धनुष
चेर राजा - विस्तृत (उपिंदर सिंह)

प्रथम ज्ञात राजा: उदियनजेराल

प्रमुख चेर शासक:

राजाउपलब्धियां
नेदुंजेराल आदनउदियनजेराल के पुत्र; 7 राजमुकुटधारी राजाओं को पराजित किया; अधिराज की उपाधि प्राप्त; हिमालय तक विजय (काव्यात्मक अतिशयोक्ति); यवन व्यापारियों को फिरौती के लिए बंदी बनाया
कुट्टुवनआदन के छोटे भाई; कोंगु विजित; पूर्वी और पश्चिमी समुद्रों तक शक्ति विस्तार
सेंगुट्टुवनआदन के पुत्र; वियालूर पर आक्रमण; कोंगु में कोडुकुर किला लिया; कण्णगी की मूर्ति के लिए पत्थर हेतु लड़े; गंगा में स्नान किया
कुडक्को इलंजेराल इरुम्पोरैअंतिम चेर राजाओं में से एक; चोलों और पांड्यों के खिलाफ विजय
मंदरंजेराल इरुम्पोरैप्रारंभिक तीसरी शताब्दी ई.; एक बार पांड्यों द्वारा बंदी बनाया पर भाग निकले

शिलालेखीय साक्ष्य:

  • पुगलूर में दूसरी शताब्दी ई. के दो शिलालेख इरुम्पोरै वंश की तीन पीढ़ियों के चेर राजकुमारों का उल्लेख करते
  • जैन भिक्षु के लिए चट्टानी आश्रय निर्माण का अभिलेख
  • एडकल शिलालेख (केरल) - तीसरी शताब्दी ई., चेर राजाओं की एक अन्य शाखा
चोल राजा - विस्तृत (उपिंदर सिंह)

सबसे प्रसिद्ध शासक: करिकाल

करिकाल का जीवन:

  • शासनकाल के प्रारंभ में पदच्युत और कैद किया गया
  • भाग निकले और स्वयं को राजा के रूप में पुनर्स्थापित किया
  • वेन्नि के युद्ध में पांड्य, चेर और सहयोगियों के संघ को पराजित किया
  • 11 शासकों ने अपने ढोल (राजसी शक्ति का प्रतीक) खोए
  • चेर राजा को पीठ पर घाव लगा → उपवास द्वारा अनुष्ठानिक आत्महत्या की
  • वहैप्परण्डलै में एक और बड़ी विजय (सरदारों ने छत्र खोए)

अन्य चोल शासक:

शासकविवरण
तोंडैमान इलंदिरैयनकांची से शासन; या तो स्वतंत्र या करिकाल के अधीनस्थ; कवि भी थे (4 बचे गीत)
नलंगिल्ली और नेदुंगिल्लीइन दो दावेदारों के बीच कटु उत्तराधिकार युद्ध

प्रमुख उद्धरण (उपिंदर सिंह):

"राजकीय ढोल (मुरचु) सुबह राजा को जगाने के लिए, युद्ध के दौरान और अन्य विशेष अवसरों पर बजाया जाता था। यह एक विशेष वृक्ष और विशेष चमड़े से बनता था, और पवित्र शक्ति से जुड़ा था।"

पांड्य राजा - विस्तृत (उपिंदर सिंह)

प्रमुख पांड्य शासक:

राजाउपलब्धियां
नेदियोनप्रारंभिक पांड्य राजा
पालशालै मुदुकुडुमिउपाधि का अर्थ "जिसके पास कई कक्ष हैं" (यज्ञ कक्ष)
नेदुंजेलियन प्रथमउनके शासनकाल में कोवलन की मृत्यु (शिलप्पदिकारम); पश्चाताप से मृत्यु
नेदुंजेलियन द्वितीयबहुत कम उम्र में तलैयालंगानम में चोल, चेर और 5 सरदारों के संघ को पराजित; चेर राजा को बंदी बनाया

शिलालेखीय साक्ष्य:

  • मंगुलम शिलालेख (प्रारंभिक दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व): नेदुंजेलियन के अधीनस्थ/संबंधी द्वारा जैन भिक्षुओं को उपहार
  • महादेवन सुझाव देते हैं कि यह नेदुंजेलियन संगम कविताओं में उल्लिखित दोनों से पहले के हो सकते हैं
  • अलगरमलै शिलालेख (लगभग पहली शताब्दी ईसा पूर्व): कालु(काटु)मर नाटन का उल्लेख, संभवतः एक पांड्य राजकुमार

महत्वपूर्ण अधिकारी (शिलालेखों से):

  • कालातिक = मोतियों का अधीक्षक (मोती मछुआरी की निगरानी)
  • कानातिकन = लिपिकों का प्रमुख
सरदार और वेलिर (उपिंदर सिंह)

तीन प्रमुख राजवंशों के अलावा, कई सरदारों (वेलिर) के पास भी शक्ति थी:

सरदारक्षेत्रआश्रित कवि
परिपिरनमलै के पास पांड्य देशकपिलर
अदिगैमान (नेदुमान अंजि)तगदूरऔवैयार (कवयित्री)
आय, अंदिरनविभिन्न क्षेत्रविभिन्न

अदिगैमान की कहानी:

  • पांड्य और चोल राजाओं द्वारा सहायता प्राप्त
  • चेर पेरुंजेराल इरुम्पोरै द्वारा पराजित
  • पहली शताब्दी ई. के जम्बई शिलालेख में उल्लिखित

कवि-संरक्षक संबंध:

"प्राचीन तमिलकम में कवि और संरक्षक के बीच संबंध पारस्परिक था... राजा भी कवि पर निर्भर था। केवल कवि द्वारा उसकी उदारता और वीरता की प्रशंसा ही उसे स्थायी यश दिला सकती थी।"

शासन संरचना
  • वंशानुगत राजतंत्र : शासन का रूप
  • राजा की उपाधियां: को, वंदन, कोट्रवन, मन्नम, इराल
  • राजा इरै (ईश्वर का प्रतिनिधि) माना जाता था
  • अवै : राजदरबार

दो सलाहकार परिषदें:

  • ऐम्पेरुंकुलु : पांच महान की सभा
  • एनपेरयम : आठ महान की परिषद

प्रशासनिक इकाइयां:

  • मंडलम (संपूर्ण राज्य)
  • नाडु (प्रमुख उप-विभाग)
  • ऊर (नगर), पेरूर (बड़ा गांव), सिरूर (छोटा गांव)
  • पट्टिनम (तटीय नगर)
  • वलनाडु, कूट्रम

ग्राम परिषदें: मनरम, अवै, पोडियिल, अंबलम

स्थानीय सरदार: वेलिर के रूप में जाने जाते

अर्थव्यवस्था

भूमि विभाजन (तोलकाप्पियम के अनुसार)
भूमि प्रकारभू-भागप्रमुख देवता
कुरिंजिपहाड़ी मार्गसेयोन (मुरुगन)
मुल्लैचारागाहमायोन
मरुदमकृषिवंदन
नेयदलतटीयवरुण
पालैमरुस्थलकोट्रवै
आर्थिक गतिविधियां
  • प्रमुख व्यवसाय : कृषि; चावल सबसे आम फसल
  • हस्तशिल्प : बुनाई, धातु कार्य, बढ़ईगीरी, जहाज निर्माण
  • आभूषण : मोती, पत्थर, हाथीदांत
  • उरैयूर का कपास : बुनाई विशेषज्ञता के कारण पश्चिम में उच्च मांग

महत्वपूर्ण बंदरगाह:

  • पुहार (तमिलनाडु)
  • तोंडि, मुजिरिस (केरल)
  • कोरकई, अरिकमेडु (तमिलनाडु)

रोमनों के साथ व्यापार:

  • रोमन सोने और चांदी के सिक्के मिले (ऑगस्टस, टाइबेरियस, नीरो)
  • पुस्तक: पेरिप्लस ऑफ द एरिथ्रियन सी
  • प्लिनी का नेचुरल हिस्ट्री : शिकायत कि रोम का सोना खत्म हो रहा
  • काली मिर्च : यूरोप में पहला मसाला; यवनप्रिय कहलाई

निर्यात: सूती वस्त्र, मसाले (काली मिर्च, अदरक, इलायची, दालचीनी, हल्दी), हाथीदांत उत्पाद, मोती, कीमती पत्थर

आयात: घोड़े, सोना, मीठी शराब

तीसरी शताब्दी ई. के बाद, हुणों द्वारा रोमन साम्राज्य समाप्त होने पर भारतीय व्यापारियों ने दक्षिण एशियाई व्यापार पर अधिक निर्भरता की

प्रमुख संगम नगर - पुरातात्विक साक्ष्य (उपिंदर सिंह)

उरैयूर (चोल राजधानी):

  • तिरुचिरापल्ली के बाहरी इलाके में स्थित
  • संगम कविताएं इसे महान किलेबंद नगर बताती हैं
  • सूती वस्त्र बुनाई के लिए प्रसिद्ध (पेरिप्लस के अनुसार)

करूर/वांजि (चेर राजधानी):

  • कई संगम कवि इसी स्थान से थे
  • अमरावती नदी के किनारे स्थित (कर्नाटक)

मदुरै (पांड्य राजधानी):

  • तीसरे संगम का स्थान के रूप में प्रसिद्ध
  • मरुंदूर क्षेत्र उत्खनन दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व से तीसरी शताब्दी ई. तक बसावट दर्शाता
  • उपलब्धियां: BRW मिट्टी के बर्तन, मोती, लोहे के औजार, चूड़ियां
  • पांड्य राजा वडुगन के सिक्के मिले

कोरकई (मोती बंदरगाह):

  • महत्वपूर्ण पांड्य बंदरगाह, संगम साहित्य में मोतियों के लिए प्रसिद्ध
  • टॉलेमी के भूगोल के कोल्कोई से पहचाना गया

कावेरीपूम्पट्टिनम (पुहार):

  • प्रारंभिक ऐतिहासिक समय में प्रमुख चोल बंदरगाह
  • ग्रीक विवरणों में खाबेरिस या कमारा कहा गया
  • संपूर्ण संगम संग्रह (पट्टिनप्पालै) इस नगर को समर्पित
  • उत्खनन तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व से 12वीं शताब्दी ई. तक इतिहास प्रलेखित
  • छोटे गांव बंदरगाह से → बड़े प्रभावशाली बंदरगाह नगर में विकास

कांची (कच्ची):

  • बाद में प्रसिद्ध पल्लव राजधानी बनी (कांचीपुरम)
  • शंकर मठ के पास प्रारंभिक ऐतिहासिक अवशेष उत्खनित
  • साक्ष्य: BRW, काला-लेपित बर्तन, रूलेटड वेयर, सातवाहन सिक्के (दूसरी शताब्दी ई.)
  • बौद्ध मंदिर संरचना पहचानी गई
कोडुमनल - औद्योगिक केंद्र (उपिंदर सिंह)

सबसे महत्वपूर्ण महापाषाण-से-प्रारंभिक-ऐतिहासिक संक्रमण स्थलों में से एक

स्थान: नोय्याल नदी का उत्तरी किनारा (कावेरी की सहायक)

पहचान: प्राचीन कोडुमनल नगर, संगम ग्रंथों में रत्न और आभूषण कार्य के लिए प्रसिद्ध

कालक्रम: तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व से तीसरी शताब्दी ई. (के. राजन संशोधित: संपूर्ण जमाव लगभग 400 ईसा पूर्व से, 'प्रारंभिक ऐतिहासिक' लेबल)

औद्योगिक साक्ष्य:

  • लोहा-और-इस्पात निर्माण: दो भट्टियां, लोहे का मैल मिला
  • रत्न कटाई (कोंगु क्षेत्र बेरिल में समृद्ध)
  • कताई और बुनाई
  • शंख चूड़ी निर्माण

लेखन साक्ष्य:

  • तमिल-ब्राह्मी लेखन वाले मिट्टी के टुकड़े
  • कुछ प्राकृत भाषा और ब्राह्मी लिपि में
  • शिलालेखों में निकम/निगम (श्रेणी) शब्द मिला

समाधि:

  • 150 से अधिक समाधि (बसावट के पूर्व और उत्तर-पूर्व में)
  • पहले: सिस्ट में द्वितीयक समाधि
  • बाद में: घरों में गड्ढा समाधि, फर्श स्तर के पास
दक्षिण भारत में नगरीकरण - विद्वान बहस (उपिंदर सिंह)

आर. चम्पकलक्ष्मी की परिकल्पना (1996):

  • सुदूर दक्षिण का प्रारंभिक ऐतिहासिक नगरीकरण गहरे सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन से प्रेरित नहीं था
  • भारत-रोमन व्यापार, अंतर-क्षेत्रीय व्यापार, और बाद में दक्षिण-पूर्व एशियाई व्यापार द्वारा उत्प्रेरित
  • व्यापार ने कुछ नगरीय क्षेत्रों को जन्म दिया, जो व्यापार के साथ तीसरी शताब्दी में गिर गए

उपिंदर सिंह का प्रति-तर्क:

"इस परिकल्पना को स्वीकार करना कठिन है क्योंकि व्यापार को गहरी सामाजिक और आर्थिक प्रक्रियाओं से असंबंधित स्वतंत्र चर नहीं माना जा सकता।"

गहरे परिवर्तनों का साक्ष्य:

  • विशेषज्ञ शिल्प: धातु कार्य, मोती निर्माण, बुनाई
  • कविताओं में बाजार वर्णन (पुहार, मदुरै)
  • समृद्ध व्यापारियों और भव्य उपहारों के संदर्भ
  • मुद्रा उपयोग की शुरुआत

समाज

सामाजिक संरचना

चार वर्ग:

  1. अरसर : शासक
  2. अंतनार : पुजारी
  3. वाणिगर : व्यापारी
  4. वेल्लालर : किसान

जनजातीय समुदाय: तोड़ा, इरुला, नाग, वेदर

आवास:

  • धनी ईंट और गारे के घरों में रहते
  • गरीब मिट्टी के घरों में रहते
महिलाओं की स्थिति
  • सम्मानित और शिक्षित; जीवनसाथी चुन सकती थीं
  • भूमिका मुख्यतः आर्थिक संदर्भ में अधीनस्थ
  • प्रारंभिक तमिल ग्रंथों में पतिव्रता और माता की ब्राह्मणीय अवधारणाएं उपस्थित

कला प्रशिक्षण:

  • इयल (साहित्य), इसै (संगीत), नाडगम (नाटक)

महिला कवि:

  • औवैयार, नच्चेल्लैयार, कक्कैपाडिनियार
  • कक्कैपादिनियार ने दो छंदशास्त्र रचनाएं लिखीं: कक्कैपादिनियम, सिरु-कक्कैपादिनियम

प्रथाएं:

  • सती (तिप्पायडल) : उच्च वर्ग में प्रचलित
  • विधवा का जीवन दुखद
  • महिलाएं स्वतंत्र रूप से घूमती थीं, मंदिर उत्सवों में भाग लेती थीं (कलित्तोगै)
  • संपत्ति अधिकार नहीं लेकिन विचारपूर्वक व्यवहार

तीन स्त्री सद्गुण (तोलकाप्पियर): अच्चम, नानम, मडम

कण्णगी (शिलप्पदिकारम): पतिव्रता के लिए प्रशंसित; लोगों द्वारा पूजित

विवाह प्रकार:

  1. प्रेम विवाह : गुप्त प्रेम और प्रणय
  2. वीरता द्वारा विवाह : सांड-युद्ध जीतकर वधू प्राप्त
  3. व्यवस्थित विवाह : रिश्तेदारों द्वारा तय; वधू मूल्य
संगम युग में महिलाएं और कार्य (उपिंदर सिंह)

विजया रामास्वामी के ([1989], 1999) विश्लेषण पर आधारित:

कृषि कार्य:

  • धान की बुवाई और निराई
  • धान की कुटाई और फटकना (पूर्णतः महिलाओं द्वारा)
  • युवा लड़कियां खेतों की निगरानी करतीं, पक्षियों और जानवरों को भगातीं

पशुपालन कार्य:

  • महिलाएं पशुपालन और डेयरी में शामिल
  • चरवाहिनों के लिए शब्द: आयिच्चियर, कोविच्चियर, इडैच्चियर

वस्त्र कार्य:

  • कताई लगभग पूर्णतः महिलाओं द्वारा
  • संगम ग्रंथ महिला कतिनकारों को परुट्टि पेंडुकल कहते
  • महिला बुनकरों का कोई संदर्भ नहीं
  • कपड़े की धुलाई और ब्लीचिंग

अन्य व्यवसाय:

  • वेन्निकुयट्टियर - वेन्नि की कुम्हारिन, कवयित्री भी (करिकाल की विजय पर कविता)
  • मछुआरिनें - मछली पकड़ना, बेचना; मछली का तेल निकालना और बेचना
  • तटीय क्षेत्रों में नमक बनाना और बेचना
  • माला बनाना और फूल बेचना
  • चेविलित्तै - धाय माताएं/दूध पिलाने वाली
  • विरलियर - पानर समुदाय की महिला गायिका और नर्तकी
  • राजाओं द्वारा महिला अंगरक्षक नियुक्त
कुटि और जाति व्यवस्था (उपिंदर सिंह)

प्राथमिक सामाजिक वर्गीकरण: कुटि

  • कुल-आधारित वंश समूह
  • प्रारंभिक तमिल कृषि उत्पादन में केंद्रीय
  • वंश और वंशानुगत व्यवसाय से जुड़ा
  • कुटि समूहों में अंतर-भोजन और सामाजिक संपर्क पर कोई प्रतिबंध नहीं

वर्ण व्यवस्था:

  • वर्ण का सामाजिक वर्गीकरण संगम कवियों को ज्ञात था
  • लेकिन कुटि सामाजिक वर्गीकरण का अधिक प्रासंगिक आधार था

जाति का उदय (विद्वान बहस):

  • राजन गुरुक्कल (1997): ब्राह्मण भूमि स्वामित्व ने प्रमुख भूमिका निभाई:
    • कुल-आधारित कृषि संगठन प्रणाली को तोड़ा
    • नई कृषि व्यवस्था का उदय
    • जाति पर आधारित सामाजिक संबंध
धार्मिक विश्वास - अनंकु (उपिंदर सिंह)

अनंकु = पवित्र/जादुई शक्तियां

  • विभिन्न वस्तुओं में निवास करती मानी गईं
  • अनंकु को नियंत्रित करने के अनुष्ठान: परियन, तूडियन, पानन, वेलन द्वारा
  • ये समूह अनुष्ठानिक गायन, नृत्य, समाधि से जुड़े
  • दाह संस्कार अग्नि जलाते और स्मारक पत्थरों की पूजा करते

जॉर्ज एल. हार्ट का सिद्धांत (1976):

"निम्न जातियों का अशुद्धता से जुड़ाव दक्षिणी मूल का है"

महिलाएं और अनंकु:

  • अनंकु महिलाओं से चिपकी मानी गई
  • यदि महिला पतिव्रता थी, उसका अनंकु नियंत्रण में (शुभ)
  • मासिक धर्म और प्रसव के बाद महिलाएं अशुद्ध मानी गईं
  • विधवाएं अत्यंत अशुभ और खतरनाक मानी गईं → कठोर जीवन
योद्धा नीति और स्मारक पत्थर (उपिंदर सिंह)

वीर का लक्ष्य: पुकल (गौरव, यश)

वीरगति:

  • संगम कविताओं में अत्यधिक मूल्यवान
  • युद्ध में मरे योद्धा की आत्मा → स्वर्ग में निवास
  • जो योद्धा युद्ध में नहीं मरे → अंतिम संस्कार से पहले तलवारों से काटे जाते ताकि युद्ध में मृत्यु का अनुकरण हो

वट्टकिरुतल:

  • उपवास द्वारा आत्महत्या का अनुष्ठान
  • पराजित राजा द्वारा किया जाता
  • जीवनकाल में निकट लोग भी साथ देते

नाटुकल (स्मारक पत्थर):

  • वीरता से लड़ते हुए मरे योद्धाओं के सम्मान में स्थापित
  • गिरे वीर की आत्मा इन पत्थरों में निवास करती मानी गई
  • महापाषाण स्मारक पत्थरों से संबंध

प्राथमिक स्रोत उद्धरण:

"यदि वह युद्ध की मोटी में भाग गया है, तो मैं ये स्तन काट दूंगी जिनसे उसने दूध पिया था... फिर उसने अपने पुत्र को टुकड़ों में पड़ा देखा और वह उस दिन से अधिक प्रसन्न हुई जिस दिन उसने उसे जन्मा।" — कक्कैपाडिनियार नच्चेल्लैयार (महिला कवि), पुरनानुरु 278

सामाजिक जीवन

त्योहार: ओणम, कार्तिगै, पोंगल, थैनीरादल, पंगुनिविलावु

  • ग्राम बुजुर्गों और विद्वानों को प्रतिष्ठा
  • प्रत्येक समारोह विलक्केट्रल (दीप प्रज्वलन) से पहले

पारिवारिक समारोह: गृह प्रवेश, शुद्धिकरण, यौवनारंभ, विवाह

वीर पत्थर (नाडुकल): मृतकों के सम्मान में स्थापित

मनोरंजन:

  • राजा और अभिजात वर्ग पानर (पेशेवर गायक/नर्तक) के गीत और संगीत का आनंद लेते
  • कुत्थु नृत्य रूप: अल्लियाक्कुत्थु, कुरवैक्कुत्थु

रीति-रिवाज:

  • कौवे का कांवना : अतिथियों के आगमन का संकेत
  • छिपकली की आवाज : अशुभ शकुन
  • स्वप्न भविष्य की पूर्व सूचना माने गए

भोजन: चावल मुख्य; मक्का और बाजरा भी उपयोग

वेशभूषा और आभूषण:

  • वृक्षों की छाल, गुंथे पत्ते, सूती, रेशम
  • धनी महिलाएं कालिंगम (महीन सूती) पहनतीं
  • विवाहित महिलाएं ताली (विवाह प्रतीक) पहनतीं
  • आभूषण: तोय्यकम, पुल्लकम, कुलै, पुंकुलि, अंगूठियां, चेन, थोडी, पायल

शिक्षा:

  • सभी सामाजिक समूहों के लिए सुलभ
  • "कहा जाता है कि केवल विद्वानों के पास ही आंखें हैं" — तिरुवल्लुवर

धर्म

धार्मिक विश्वास
  • प्रमुख देवता : मुरुगन (पहाड़ के देवता)
  • अन्य देवता: कोट्रवै (शक्ति), शिव, तिरुमाल (मायावन)

भूमि प्रकार के अनुसार देवता (तोलकाप्पियम):

भूमिप्रमुख देवता
कुरिंजिसेयोन (मुरुगन)
मुल्लैमायोन
मरुदमवंदन
नेयदलवरुण
पालैकोट्रवै

अन्य देवता: शिव, इंद्र, वरुण, कुबेर, यम, तिरुमाला, बलराम

मातृ देवी (कोट्रवै):

  • शिवशक्ति की पत्नी
  • ब्रह्मांडीय ऊर्जा का प्रतिनिधित्व

नाडुकल/विरुकल पूजा:

  • वीरता के लिए स्थापित वीर पत्थर

पितृ पूजा:

  • मृतकों को अर्पण
  • वीरक्कल (वीर पत्थर), नाडुकल (स्मारक पत्थर)

संगम साहित्य

वर्गीकरण

मोटे तौर पर वर्गीकृत:

  1. मेल्कण्णक्कु (आख्यान) : 18 प्रमुख ग्रंथ, 8 संकलन, 10 इडिल
  2. किल्कणक्कु (उपदेशात्मक) : 18 लघु उपदेशात्मक रचनाएं
प्रमुख साहित्यिक रचनाएं

तोलकाप्पियम:

  • तोलकाप्पियर द्वारा लिखित
  • सबसे प्राचीन तमिल साहित्यिक रचना
  • मुख्यतः व्याकरण पर; राजनीतिक और सामाजिक-आर्थिक अंतर्दृष्टि भी

एट्टुतोगै (आठ संकलन):

  • ऐंगुरुनूरु, नर्रिणै, अगनानूरु, पुरनानूरु
  • कुरुंतोगै, कलित्तोगै, परिपादल, पदिर्रुप्पट्टु

पदिनेंकिल्कणक्कु (18 लघु रचनाएं):

  • नैतिकता और नीतिशास्त्र पर केंद्रित
  • तिरुक्कुरल तिरुवल्लुवर द्वारा : सबसे महत्वपूर्ण रचना

पांच प्रमुख महाकाव्य:

  1. शिलप्पदिकारम (इलंगो अडिगल) : बची
  2. मणिमेकलै (सीत्तलै सट्टनार) : बची
  3. जीवक चिंतामणि : बची
  4. वलयपति : लुप्त
  5. कुंडलकेसी : लुप्त
महान महाकाव्य

शिलप्पदिकारम:

  • कोवलन (पुहार के व्यापारी) और कण्णगी की दुखद कथा
  • कोवलन माधवी (नर्तकी) के प्रेम में पड़ा, पत्नी कण्णगी की उपेक्षा
  • पांड्य राजा द्वारा कोवलन का अन्यायपूर्ण वध
  • कण्णगी ने उसकी मृत्यु का प्रतिशोध लिया
  • बाद में पतिव्रता की देवी के रूप में पूजित (कण्णगी/पत्तिनी पंथ)

मणिमेकलै:

  • शिलप्पदिकारम की अगली कड़ी
  • कोवलन और माधवी की पुत्री की कथा
  • उसने स्वयं को बुद्ध, धम्म, संघ को समर्पित किया

तिरुमुरुगात्रुप्पडै और परिपादल:

  • मुरुग, विष्णु, शिव, दुर्गा पर कविताएं

कला और वास्तुकला

वास्तुकला और नगर नियोजन

धर्मनिरपेक्ष वास्तुकला:

  • कुरुंबै : गरीबों के फूस के घर (कुश, दर्भ, उगम घास)
  • वालमनै, नगर : धनी/अभिजात वर्ग के बड़े घर
  • राजमहल : विस्तृत प्रवेश द्वारों वाले किलेबंद

धार्मिक वास्तुकला:

  • मंदिर कोट्टम, नियमम, कोइल कहलाते
  • प्रारंभिक मंदिर : सरल लकड़ी की संरचनाएं (पोडियिल)
  • कंडु : पूजित लकड़ी का तख्ता
  • दीवारों पर देवताओं के चित्र
  • मंदिर ईंट की दीवारों और लकड़ी की छतों के साथ विकसित
  • मंडपम (कक्ष) सामूहिक उपासना के लिए जोड़े गए

मडक्कोइल शैली:

  • चेर राजा कोचेंगन्नन (तीसरी-छठी शताब्दी ई.) द्वारा प्रस्तुत
  • पेरुन्तिरुक्कोइल के नाम से जाना
  • खाली ताल (उठा मंच) पर अद्वितीय विमान (मीनार)
  • ऊंचा डिजाइन बाढ़ से सुरक्षा
  • कोचेंगन्नन ने 70 मडक्कोइल मंदिर बनाए (तंजावुर-कुंभकोणम क्षेत्र)
  • ईंट, मिट्टी, गारे से निर्मित (क्षय के प्रति संवेदनशील)
  • इस काल में ग्रेनाइट का उपयोग नहीं

नगर नियोजन:

  • पुहार (कावेरीपूम्पट्टिनम) : सुनियोजित (शिलप्पदिकारम के अनुसार)
  • अलग बाजार क्षेत्र, बंदरगाह, किलेबंद बस्तियां
नृत्य और संगीत

नृत्य:

  • मूलतः लोक परंपरा; 300-600 ई. तक संरचित पेशे में विकसित
  • शिलप्पदिकारम प्रकार, शिक्षक (अडलासन), संगीतकार, मंच सेटअप विस्तृत
  • औपचारिक शिक्षा 5 वर्ष की आयु में; प्रशिक्षण 7 वर्ष
  • नृत्य पुस्तिका: नट्टियण्णूल
  • नृत्य नट्टुवंगम (संगीत समूह) के साथ

संगीत और वाद्य:

  • ताल (कोट्टि) : लयबद्ध ताल; संगीत का आधार
  • संगीतकार: पानर, पोरुणर, कोडियर, विरलियर, कूत्तर
  • वाद्य: याल (तंतुवाद्य), बांसुरी, ढोल
  • मुगवै पाट्टु : अनाज मापते समय गाया
चित्रकला और मूर्तिकला
  • ओवियम : चित्रों/पेंटिंग के लिए तमिल शब्द
  • मणिमेकलै चित्रकला ग्रंथ (ओवियाजेन्नू) का उल्लेख
  • ओविय एलिनी : मंच के लिए चित्रित पृष्ठभूमि
  • कोल (वट्टिगै) : चित्रकला के लिए ब्रश
  • चित्र मंडप : चित्रों का कक्ष (ग्रीक, अवंति, मगध कलाकारों की विशेषज्ञता)

पतन

पतन के कारण
  1. कलभ्र आक्रमण : सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक स्थिरता को विघटित किया; ~250 वर्ष शासन; चोल, पांड्य, चेर को उखाड़ा
  2. व्यापार पतन : रोमन साम्राज्य के पतन के बाद रोम के साथ समुद्री व्यापार गिरा; आर्थिक मंदी
  3. ब्राह्मणीय प्रभाव : वैदिक परंपराओं के प्रसार ने तमिल परंपराओं को क्षीण किया; संस्कृत संरक्षण ने संगम साहित्य को प्रभावित
  4. प्राकृतिक आपदाएं : पुहार की बाढ़ (शिलप्पदिकारम); ग्रामीणीकरण में योगदान
  5. पल्लवों का उदय : छठी शताब्दी ई. तक पल्लव प्रमुख शासक बने; वैदिक परंपराओं और मंदिर-आधारित अर्थव्यवस्था ने नए चरण को चिह्नित किया

महत्व

विरासत

संगम युग तमिल इतिहास में स्वर्ण युग का प्रतिनिधित्व करता है, जो तमिल साहित्यिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक विकास के प्रारंभिक चरण को चिह्नित करता है।

इसने नींव रखी:

  • समृद्ध भाषाई परंपराओं के लिए
  • कलात्मक अभिव्यक्तियों के लिए
  • प्रशासनिक प्रणालियों के लिए जो बाद की शताब्दियों में विकसित हुईं