भारतीय कला एवं चित्रकला
प्रागैतिहासिक चित्रकला
भीमबेटका (Bhimbetka) गुफाओं की भौगोलिक स्थिति क्या है और इसकी खोज 1957-58 में किस प्रसिद्ध पुरातत्वविद् द्वारा की गई थी? (भीमबेटका खोज)
- स्थान: मध्य प्रदेश के रायसेन जिले में विंध्य पर्वत श्रृंखला की तलहटी में स्थित।
- खोजकर्ता: वी.एस. वाकणकर ने 1957-58 में दुर्घटनावश इन गुफाओं की खोज की थी।
- यूनेस्को दर्जा: 2003 में इसे यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल किया गया था।
भीमबेटका के शैल चित्रों में शिकार, पशु और अनुष्ठानों के चित्रण के लिए किन प्राकृतिक रंगों और खनिजों का उपयोग किया गया था? (भीमबेटका चित्रकला तकनीक)
- प्राकृतिक रंग: मुख्य रूप से लाल (हेमेटाइट/गेरू से), सफेद (चूने/खड़िया से), हरा (तांबे के खनिजों से) और पीले रंगों का उपयोग किया गया था।
- स्थायित्व का कारण: रंगों को चट्टानों की सतह से जोड़ने के लिए जंगली पेड़ों के गोंद, राल और पशुओं की वसा/चर्बी को मिलाया जाता था।
- विषय: जंगली जानवरों (बैल, हाथी, बाघ, हिरण), सामूहिक शिकार के दृश्यों, घुड़सवारों, नृत्यों और धार्मिक/अनुष्ठानिक उत्सवों का जीवंत अंकन।
भीमबेटका के शैल चित्रों को उत्तर पुरापाषाण काल (Upper Paleolithic) से लेकर मध्यकालीन काल (Medieval Period) तक किन मुख्य स्थापत्य/कलात्मक विशेषताओं में वर्गीकृत किया गया है? (भीमबेटका काल वर्गीकरण)
- उत्तर पुरापाषाण काल: विशाल रेखीय प्रस्तुतियाँ (Linear representations), मुख्य रूप से हरे और गहरे लाल रंगों में बड़ी पशु आकृतियाँ।
- मध्यपाषाण काल (Mesolithic): सबसे बड़ा समूह। चित्रों का आकार छोटा (लघु चित्र), शिकार के दृश्यों की प्रचुरता, दौड़ते हुए पशु और धनुष-बाण लिए मानव आकृतियाँ।
- ताम्रपाषाण काल (Chalcolithic): तांबे के हथियारों के चित्र, धातु के बर्तनों के साथ मानव, माल ढोने वाले पशु और लाल-पीले रंग का अधिक उपयोग।
- प्रारंभिक ऐतिहासिक काल: धार्मिक प्रतीकों का उदय, यक्ष-यक्षिणी आकृतियां, सज-धज कर युद्ध पर जाते सैनिक और रथों के चित्र।
- मध्यकालीन काल: ज्यामितीय पैटर्न, योजनाबद्ध या केवल रेखाचित्र के रूप में सरल आकृतियाँ, कलात्मक गिरावट के लक्षण।
जोगीमारा गुफाएं, एडक्कल गुफाएं और कुपगल की नवपाषाण कालीन शैल कला की क्या विशेषताएं व स्थान हैं? (अन्य प्रागैतिहासिक चित्रकला स्थल)
- जोगीमारा गुफाएं (छत्तीसगढ़): सरगुजा जिले में स्थित। यहाँ भारत के सबसे पुराने गैर-धार्मिक (धर्मनिरपेक्ष) भित्तिचित्र मिले हैं, जिनमें एक दासी सुतनुका और देवदत्त नामक रूपकार की प्रेम कहानी का प्राचीनतम ब्राह्मी शिलालेख भी है।
- एडक्कल गुफाएं (केरल): वायनाड जिले में स्थित। यहाँ के चित्र नवपाषाण काल (Neolithic) के माने जाते हैं, जिनमें नक्काशीदार चित्र (Petroglyphs) मिले हैं, जो सामान्य चित्रों से भिन्न चट्टान को कुरेदकर बनाए गए हैं।
- कुपगल (कर्नाटक): बेल्लारी जिले में स्थित। यहाँ पत्थरों पर खरोंचकर बनाई गई नवपाषाण कालीन शैल कला मिली है, जिसमें कूबड़ वाले सांड (Brahminy Bulls) की आकृतियां प्रमुख हैं।
प्राचीन और शास्त्रीय चित्रकला
अजंता की गुफाओं की भौगोलिक स्थिति, वाकाटक राजवंश (विशेषकर राजा हरिषेण) का संरक्षण और हीनयान व महायान चरणों के अंतर का विवरण क्या है? (अजंता ऐतिहासिक पृष्ठभूमि)
- भौगोलिक स्थिति: महाराष्ट्र के औरंगाबाद (छत्रपति संभाजीनगर) जिले में वाघोरा नदी के किनारे अर्धगोलाकार (घोड़े की नाल के आकार की) पहाड़ियों को काटकर बनाई गई 29 गुफाएं।
- राजकीय संरक्षण: वाकाटक राजवंश (विशेषकर सम्राट हरिषेण के काल में, 5वीं शताब्दी ई.) और गुप्त राजाओं के अधीन इसका सर्वाधिक विकास हुआ।
- हीनयान चरण (प्रारंभिक): गुफा संख्या 9, 10, 12, 13 और 15। यहाँ बुद्ध का कोई मानवीय रूप में अंकन नहीं है, केवल उनके प्रतीकों (जैसे स्तूप, चरण चिह्न) की पूजा की जाती थी।
- महायान चरण (परवर्ती): शेष गुफाएं। यहाँ बुद्ध की विशाल मूर्तियाँ और मानवीय रूपों में भित्ति चित्र (जैसे बोधिसत्वों के चित्र) प्रचुर मात्रा में बने।
अजंता में भित्ति चित्र (Mural Paintings) बनाने के लिए प्रयुक्त 'फ्रेस्को' (Fresco) और 'टेम्पेरा' (Tempera) तकनीक में क्या अंतर है और यहाँ किस विशिष्ट रंग की अनुपस्थिति देखी गई है? (अजंता चित्रकला तकनीक)
- तकनीक का मिश्रण: अजंता के चित्र पूरी तरह से 'सच्चे फ्रेस्को' (गीले प्लास्टर पर चित्र) नहीं हैं, बल्कि ये मुख्य रूप से टेम्पेरा (Tempera) तकनीक पर आधारित हैं, जहाँ सूखे प्लास्टर पर रंगों को कार्बनिक माध्यमों (जैसे गोंद या अंडे की सफेदी) के साथ मिलाकर लगाया जाता था।
- दीवार की तैयारी: चट्टान की खुरदरी दीवार पर मिट्टी, गाय का गोबर, और धान की भूसी का लेप लगाया जाता था। उसके ऊपर चूने के प्लास्टर की एक महीन परत चढ़ाई जाती थी।
- नीले रंग की अनुपस्थिति: अजंता के प्रारंभिक चित्रों में नीले रंग (Lapis Lazuli) का उपयोग नहीं देखा गया है, क्योंकि नीला पत्थर सुदूर बदख्शां (अफगानिस्तान) से आयात करना पड़ता था, जो बाद के महायान चित्रों में ही दिखाई दिया।
अजंता की गुफाओं में पद्मपाणि बोधिसत्व, वज्रपाणि बोधिसत्व और मरणासन्न राजकुमारी (Dying Princess) के चित्र किस-किस गुफा संख्या में स्थित हैं? (अजंता के प्रसिद्ध चित्र)
- पद्मपाणि बोधिसत्व (गुफा संख्या 1): हाथ में नीलकमल (Blue Lotus) धारण किए हुए बोधिसत्व का चित्र, जो करुणा और सौम्यता का प्रतीक है।
- वज्रपाणि बोधिसत्व (गुफा संख्या 1): हाथ में वज्र (Thunderbolt) धारण किए हुए बोधिसत्व का चित्र, जो आध्यात्मिक शक्ति और दृढ़ता को दर्शाता है।
- मरणासन्न राजकुमारी (Dying Princess - गुफा संख्या 16): अपने पति (बुद्ध के सौतेले भाई नंद) द्वारा संसार त्याग कर बौद्ध भिक्षु बनने की खबर सुनकर मरणासन्न अवस्था में पड़ी राजकुमारी सुंदरी का अत्यंत कारुणिक चित्र।
- शिबि जातक (गुफा संख्या 17): राजा शिबि द्वारा एक कबूतर की जान बचाने के लिए अपने शरीर का मांस बाज को तराजू में तौलकर दान देने की कथा का सुंदर चित्रण।
गुप्तकालीन बाघ गुफाओं (Bagh Caves) की कुल संख्या, निर्माण सामग्री और प्रसिद्ध चित्र 'बाघ नर्तक' की कलात्मक शैली क्या है? (बाघ गुफा चित्रकला)
- स्थान और संख्या: मध्य प्रदेश के धार जिले में बाघिनी नदी के किनारे स्थित 9 बौद्ध गुफाओं का समूह, जो गुप्त काल (5वीं-6वीं शताब्दी ई.) में निर्मित हुईं।
- निर्माण सामग्री: ये बलुआ पत्थर (Sandstone) की पहाड़ियों को काटकर बनाई गई थीं। इन चट्टानों के अत्यधिक भुरभुरे होने के कारण अब अधिकांश गुफाएं ढह चुकी हैं।
- बाघ नर्तक (Bagh Dancers): गुफा संख्या 4 (रंग महल) में संगीतकारों और नर्तकियों के एक जीवंत समूह का चित्र है, जिसमें महिलाओं का एक समूह एक पुरुष नर्तक के चारों ओर नृत्य कर रहा है।
- शैली: अजंता शैली के समान है, लेकिन बाघ के चित्रों में धार्मिक विषयों (जातक कथाओं) के बजाय लोक जीवन, नृत्य, संगीत और राजसी उत्सवों के धर्मनिरपेक्ष विषयों को प्राथमिकता दी गई है।
एलोरा गुफाओं (5वीं-11वीं शताब्दी ई.) में मिलने वाले भित्ति चित्रों के अवशेषों की अजंता की तुलना में क्या स्थिति है और ये किस कारण अधिक प्रसिद्ध हैं? (एलोरा भित्ति चित्रकला)
- भित्ति चित्रों के अवशेष: एलोरा (महाराष्ट्र) में चित्रकला के बहुत कम अवशेष बचे हैं, जो मुख्य रूप से कैलाश मंदिर (गुफा 16) और कुछ जैन गुफाओं (जैसे इंद्र सभा) की छतों पर स्थित हैं।
- कलात्मक अंतर: एलोरा के चित्र कोणीय (Angular) और तीखे रेखाचित्रों से युक्त हैं। अजंता की सौम्य व लहराती रेखाओं के विपरीत एलोरा की कला अधिक आक्रामक और गत्यात्मक है।
- मूर्तिकला की प्रधानता: एलोरा भित्ति चित्रों के बजाय अपनी बेजोड़ शैलकट मूर्तिकला (जैसे रावण द्वारा कैलाश पर्वत उठाना) और वास्तुकला के लिए अधिक प्रसिद्ध है।
तमिलनाडु के पुदुक्कोट्टई में स्थित सित्तनवासल (Sittanavasal) गुफाओं के जैन चित्रों की मुख्य विशेषताएं और प्रसिद्ध 'कमल सरोवर' (Lotus Pond) का क्या कलात्मक महत्व है? (सित्तनवासल जैन चित्र)
- काल और धर्म: यह 7वीं-9वीं शताब्दी ई. (पांड्य राजवंश के काल) में निर्मित जैन गुफा मंदिर है।
- कमल सरोवर (Lotus Pond): छत पर चित्रित एक प्रसिद्ध तालाब का दृश्य, जिसमें तीन दीक्षा लेने वाले पुरुष (भिक्षु) पानी में खिले कमलों को तोड़ रहे हैं। तालाब में मछलियां, हंस, भैंस और हाथी तैरते हुए दिखाए गए हैं।
- तकनीक: अजंता की तरह ही यह भी सूखे चूने के प्लास्टर पर बनाई गई उत्कृष्ट चित्रकारी है, जिसमें गहरे लाल, पीले और हरे रंगों का सुंदर संयोजन है।
मध्यकालीन चित्रकला
पाल साम्राज्य के अधीन बंगाल और बिहार में ताड़पत्र (Palm Leaf) और कपड़े पर विकसित पांडुलिपि कला (Manuscript Art) की क्या विशेषताएं व प्रमुख बौद्ध ग्रंथ हैं? (पाल शैली चित्रकला)
- क्षेत्र और काल: 9वीं से 12वीं शताब्दी ई. के दौरान बंगाल और बिहार में पाल शासकों (जैसे धर्मपाल, देवपाल) के अधीन फली-फूली।
- माध्यम: अत्यंत संकीर्ण ताड़पत्रों (Palm Leaves) पर सूक्ष्म चित्र बनाए जाते थे, जिन्हें आपस में जोड़कर पांडुलिपियां तैयार की जाती थीं।
- बौद्ध वज्रयान विषय: मुख्य रूप से बौद्ध देवी-देवताओं (जैसे तारा, अवलोकितेश्वर) और महायान-वज्रयान दर्शन के ग्रंथों का चित्रण।
- प्रसिद्ध रचना: 'अष्टसाहस्रिका प्रज्ञापारमिता' (आठ हजार श्लोकों में प्रज्ञा की पूर्णता) की सचित्र पांडुलिपि।
- विशेषताएं: कोणीय आकृतियाँ, पतली रेखाएँ और अजंता की शास्त्रीय कला के अंतिम अवशेषों का संकुचित रूप।
पश्चिमी भारत (गुजरात व राजस्थान) की जैन पांडुलिपि शैली के कोणीय चेहरे, उभरी हुई आँखों और कल्पसूत्र जैसे ग्रंथों के चित्रांकन की क्या विशेषताएं हैं? (पश्चिमी भारतीय / जैन शैली)
- क्षेत्र और काल: 11वीं से 15वीं शताब्दी ई. के दौरान गुजरात, राजस्थान और मालवा के क्षेत्रों में जैन व्यापारियों के संरक्षण में विकसित।
- माध्यम: शुरुआत में ताड़पत्रों पर और बाद में (14वीं शताब्दी के बाद) कागज़ पर चित्रों का निर्माण शुरू हुआ।
- शारीरिक विशेषताएं:
- चेहरे का कोणीय और नुकीला होना।
- चेहरे के प्रोफाइल (साइड व्यू) में भी दोनों आँखों का दिखाई देना, जिसमें दूसरी आँख चेहरे की सीमा से बाहर हवा में तैरती हुई प्रतीत होती है।
- उभरी हुई और लंबी आँखें (काजल लगी हिरण जैसी आँखें)।
- रंग: लाल, पीले रंगों के साथ-साथ सोने (Gold) और चमकीले नीले (Ultramarine Blue) रंगों का अत्यधिक उपयोग।
- मुख्य ग्रंथ: कल्पसूत्र (जैन तीर्थंकरों के जीवन चरित्र) और कालकाचार्यकथा के सचित्र ग्रंथ।
लघु चित्रकला शैलियां
हुमायूं द्वारा लाए गए फारसी चित्रकारों (मीर सैयद अली और अब्दुस समद) तथा अकबर के काल में 'हमज़ानामा' और 'अकबरनामा' के चित्रांकन की क्या विशेषताएं थीं? (अकबर कालीन चित्रकला)
- फारसी नींव: हुमायूं जब ईरान से वापस भारत आया, तो वह अपने साथ दो प्रसिद्ध फारसी चित्रकारों - मीर सैयद अली और ख्वाजा अब्दुस समद को लेकर आया, जिन्होंने मुगल चित्रकला की नींव रखी।
- अकबर का योगदान: उसने एक विशाल शाही चित्रशाला (तस्वीरखाना) की स्थापना की जहाँ भारतीय और फारसी चित्रकार मिलकर काम करते थे।
- हमज़ानामा (Hamzanama): अकबर के काल का पहला बड़ा सचित्र ग्रंथ, जिसमें सूती कपड़े पर अमीर हमज़ा के कारनामों के 1200 से अधिक विशाल चित्र बने।
- अकबरनामा: अकबर के जीवन पर आधारित ऐतिहासिक दृश्यों, युद्धों, किलों की घेराबंदी और दरबारी उत्सवों का भव्य चित्रांकन।
- विशेषताएं: चित्र काफी गत्यात्मक (Action-oriented), भीड़-भाड़ वाले दृश्यों से युक्त और चमकीले रंगों वाले थे।
सम्राट जहांगीर के काल में लघु चित्रकला में आए प्राकृतिक बदलावों (पशु, पक्षियों, फूलों के वैज्ञानिक चित्र) और प्रसिद्ध चित्रकार मंसूर का क्या योगदान था? (जहांगीर कालीन चित्रकला)
- व्यक्तिगत रुचि: जहांगीर स्वयं चित्रकला का महान पारखी था। उसके काल में मुगल चित्रकला अपने सर्वोच्च कलात्मक शिखर पर पहुँची।
- प्रकृति और वैज्ञानिक अंकन: बड़े युद्ध दृश्यों के स्थान पर प्रकृति, दुर्लभ पशुओं, पक्षियों और फूलों के यथार्थवादी एकल चित्र बनाने पर बल दिया गया।
- उस्ताद मंसूर: जहांगीर का सबसे प्रसिद्ध चित्रकार, जो प्राकृतिक चित्रों के लिए जाना जाता था। उसके प्रसिद्ध चित्र हैं - साइबेरियन क्रेन (सारस) और तुर्की मुर्गा (Dodo/Turkey)।
- विशेषताएं: बारीक ब्रश कार्य (तूलिका कार्य), चित्रों के चारों ओर विस्तृत सुंदर बेल-बूटों वाले बॉर्डर (margins) का विकास और यूरोपीय प्रभाव में प्रभा-मंडल (Halo/Nimbus) का अंकन।
शाहजहां और औरंगजेब काल में लघु चित्रकला की औपचारिकता/बॉर्डर निर्माण और औरंगजेब के काल में मुगल चित्रकला के पतन के क्या कारण थे? (शाहजहां व औरंगजेब काल)
- शाहजहां काल: वास्तुकला की ओर अधिक झुकाव। चित्रकला अधिक औपचारिक (Formal) और दरबारी वैभव को दर्शाने वाली हो गई। सोने और कीमती रंगों का प्रचुर उपयोग बढ़ा, लेकिन चित्रों में जहांगीर काल जैसी जीवंतता और कलात्मक स्वतंत्रता कम हो गई।
- औरंगजेब काल (पतन): औरंगजेब ने चित्रकला को गैर-इस्लामी मानकर राजकीय संरक्षण पूरी तरह से बंद कर दिया।
- शाही कलाकारों का पलायन: संरक्षण समाप्त होने के कारण दरबारी चित्रकार दिल्ली छोड़कर प्रांतीय राज्यों (जैसे राजस्थान के राजपूत राज्यों और पंजाब की पहाड़ियों) की ओर पलायन कर गए, जिससे नई क्षेत्रीय शैलियों (राजपूत और पहाड़ी शैलियों) का तीव्र विकास हुआ।
मेवाड़ शैली के गहरे रंगों और बूंदी-कोटा उप-शैलियों में प्रकृति, शिकार और रात्रिकालीन दृश्यों के अंकन की क्या विशेषताएं हैं? (मेवाड़ व बूंदी-कोटा चित्रकला)
- मेवाड़ शैली (उदयपुर): सबसे पुरानी राजपूत शैलियों में से एक। इसकी विशेषता गहरे लाल और पीले रंगों का प्रचुर उपयोग, कोणीय आकृतियां और रामायण व भागवत पुराण जैसे पौराणिक ग्रंथों का सरल लेकिन सशक्त प्रस्तुतीकरण है।
- बूंदी-कोटा शैली:
- प्रकृति और वनस्पति: पहाड़ियों, घने जंगलों और पानी में तैरती बत्तखों का जीवंत अंकन।
- कोटा शैली: अपने विशाल शिकार दृश्यों (Hunting Scenes) के लिए प्रसिद्ध है, जिसमें राजाओं और रानियों को शेर व जंगली सूअरों का शिकार करते हुए दिखाया गया है।
- आकाश: बादलों और बिजली कड़कने के नाटकीय प्रभावों का अंकन।
किशनगढ़ शैली के अंतर्गत निहाल चंद द्वारा चित्रित 'बनी-ठनी' (Bani Thani) की शारीरिक विशेषताएं और इसका कलात्मक/धार्मिक संदर्भ क्या है? (किशनगढ़ बनी-ठनी)
- राजा सावंत सिंह का संरक्षण: किशनगढ़ (राजस्थान) के राजा सावंत सिंह (जो स्वयं नागरीदास के नाम से कृष्ण भक्त कवि थे) के काल में 18वीं सदी में विकसित।
- चित्रकार निहाल चंद: उन्होंने राजा की प्रेयसी विष्णुप्रिया (जो एक सुंदर कवयित्री थीं) को राधा के रूप में चित्रित किया, जिसे 'बनी-ठनी' कहा गया। इसे 'भारतीय मोनालिसा' भी कहा जाता है।
- शारीरिक विशेषताएं:
- धनुषाकार या कमल जैसी लंबी आँखें (Lotus-shaped eyes)।
- अत्यधिक पतली और घुमावदार भौंहें (Curved eyebrows)।
- तीखी और नुकीली नाक तथा लंबी उंगलियाँ।
- लंबी हंस-जैसी गर्दन (Swan-like neck)।
- धार्मिक संदर्भ: यह श्रृंगार रस और राधा-कृष्ण के प्रति दिव्य भक्ति का एक सुंदर मिश्रण है।
राजपूत शैली की मारवाड़ (जोधपुर) और बीकानेर उप-शैलियों पर मुगलों के प्रभाव और उनके रंग संयोजनों का क्या विवरण है? (मारवाड़ व बीकानेर चित्रकला)
- मारवाड़ शैली (जोधपुर): इसमें पुरुषों को विशाल पगड़ियों के साथ और महिलाओं को पारदर्शी ओढ़नी में दर्शाया गया है। पीले और लाल रंगों की प्रधानता है। लोक कथाओं (जैसे ढोला-मारू की प्रेम कहानी) का अंकन प्रमुख है।
- बीकानेर शैली: मुगल चित्रकला से सर्वाधिक प्रभावित राजपूत शैली। यहाँ के चित्रकार परिष्कृत रेखांकन और सूक्ष्म रंगों का उपयोग करते थे। यहाँ चित्रों पर चित्रकार का नाम और तिथि लिखने की अनूठी 'उस्ता कला' परंपरा भी विकसित हुई।
पहाड़ी चित्रकला की शुरुआती 'बसोहली शैली' के तीव्र रंगों और 'गुलेर शैली' की परिपक्व प्राकृतिकता की क्या विशेषताएं हैं? (बसोहली व गुलेर शैलियां)
- बसोहली शैली (जम्मू पहाड़ियां): पहाड़ी लघु चित्रकला की सबसे पुरानी शैली। इसकी विशेषता चटक प्राथमिक रंगों (जैसे पीला, लाल, नीला), कोणीय चेहरों और आँखों में तीव्र भावों का होना है। पृष्ठभूमि में भृंग कीट के पंखों (Beetle Wings) के टुकड़ों का उपयोग करके आभूषणों को चमकाया जाता था।
- गुलेर शैली: बसोहली की तुलना में अधिक शांत, कोमल और परिष्कृत शैली। इसमें आकृतियों की शारीरिक बनावट में गोलाई और चेहरों पर एक शांत भाव झलकता है, जो कांगड़ा शैली का आधार बना।
पहाड़ी शैली की सबसे प्रसिद्ध 'कांगड़ा शैली' के रोमांटिक कृष्ण-राधा विषयों और 'चंबा शैली' के गीतात्मक महिला चित्रों का क्या विवरण है? (कांगड़ा व चंबा शैलियां)
- कांगड़ा शैली (हिमाचल प्रदेश):
- राजा संसार चंद के संरक्षण में 18वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में विकसित हुई।
- रोमांटिक विषय: मुख्य रूप से जयदेव के 'गीत गोविंद', 'बिहारी सतसई' और भागवत पुराण से प्रेरित कृष्ण-राधा के अलौकिक प्रेम का चित्रांकन।
- विशेषताएं: अत्यंत कोमल और महीन रेखाएं, शांत व प्राकृतिक रंग, और पृष्ठभूमि में पेड़ों (विशेषकर विलो और सरो) व पहाड़ों का सुंदर अंकन।
- चंबा शैली: अपनी गीतात्मकता और महीन नक्काशी के लिए प्रसिद्ध। यहाँ महिलाओं के चित्रों में असाधारण सुंदरता और कपड़ों की सिलवटों को बहुत बारीकी से दिखाया गया है।
बीजापुर, गोलकुंडा और हैदराबाद में विकसित दक्कन शैली (Deccan Style) के तुर्की-फारसी प्रभाव, सोने की चमक और काल्पनिक वनस्पतियों के अंकन की क्या विशेषताएं हैं? (दक्कन चित्रकला शैली)
- स्वतंत्र विकास: यह उत्तरी भारत की मुगल शैली से पहले से दक्कन के सल्तनतों में विकसित हो रही थी।
- विदेशी प्रभाव: फारसी, तुर्की और यूरोपीय शैलियों का सीधा प्रभाव था।
- विशेषताएं:
- पृष्ठभूमि में सोने (Gold Leaf) का अत्यधिक और भव्य उपयोग।
- ऊंचे और पतले इंसानी कद तथा दक्कन के स्थानीय परिदृश्य का अंकन।
- काल्पनिक वनस्पतियां: चित्रों में ऐसे फूल और पेड़ दिखाए गए हैं जो वास्तविकता में भारत में नहीं पाए जाते थे, जो फारसी कल्पना को दर्शाते हैं।
- बीजापुर का 'रागमाला' चित्रण और गोलकुंडा के ऐतिहासिक चित्र इसके प्रमुख उदाहरण हैं।
लोक और आदिवासी चित्रकला
बिहार के मिथिला क्षेत्र की मधुबनी (Madhubani) चित्रकला के चावल पेस्ट माध्यम, दोहरी रेखा सीमाओं और उसके धार्मिक विषयों का विवरण क्या है? (मधुबनी चित्रकला)
- स्थान: बिहार का मिथिला क्षेत्र (दरभंगा, मधुबनी)।
- माध्यम: पारंपरिक रूप से मिट्टी की लिपी दीवारों पर और अब कागज़/कपड़े पर। रंगों को प्राकृतिक स्रोतों (जैसे हल्दी, नील, कुसुम के फूल) से तैयार किया जाता है और बाइंडिंग के लिए चावल के पेस्ट (पिसे हुए चावल का घोल) का उपयोग किया जाता है।
- दोहरी रेखा सीमाएं: चित्रों की बाहरी सीमाओं को हमेशा दोहरी रेखाओं से बनाया जाता है, जिनके बीच की खाली जगह को छोटी समानांतर रेखाओं से भरा जाता है।
- कोई खाली स्थान नहीं: चित्रकार कैनवास पर कोई भी जगह खाली नहीं छोड़ते; खाली स्थानों को फूलों, पत्तियों, पक्षियों और ज्यामितीय पैटर्नों से भर दिया जाता है।
- विषय: हिंदू पौराणिक कथाएं (रामायण के दृश्य, कृष्ण लीला, दुर्गा पूजा) और उर्वरता के प्रतीक (मछली, तोता, कछुआ)।
- जीआई टैग: इसे भौगोलिक संकेतक (GI Tag) प्राप्त है।
ओडिशा की पट्टचित्र (Pattachitra) कला के कपड़े के माध्यम, वैष्णव विषयों और ताड़पत्र पर बनाई जाने वाली 'तालपट्टचित्र' शैली की क्या विशेषताएं हैं? (पट्टचित्र चित्रकला)
- स्थान: ओडिशा (विशेषकर पुरी और रघुराजपुर गाँव)।
- माध्यम: पट्ट (कपड़े) पर बनाया जाता है। इमली के बीजों के पेस्ट और खड़िया मिट्टी के लेप से सूती कपड़े को कड़ा किया जाता है, फिर उस पर प्राकृतिक खनिज रंगों से चित्रकारी की जाती है।
- वैष्णव विषय: भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की त्रिमूर्ति, कृष्ण लीला और दशावतार के दृश्य।
- तालपट्टचित्र: ताड़पत्रों (Palm Leaves) पर लोहे की सुई (Stylus) से कुरेदकर बनाई जाने वाली सूक्ष्म चित्रकारी, जिस पर काजल या काली स्याही फेरकर चित्र उभारे जाते हैं।
- विशेषताएं: मोटी और स्पष्ट रूपरेखा (Outline), कोणीय चेहरे और चेहरे पर पार्श्व दृश्य (Profile View) का अंकन।
महाराष्ट्र की वार्ली (Warli) चित्रकला की ज्यामितीय आकृतियों (त्रिकोण व वृत्त), मिट्टी की पृष्ठभूमि और देवी पालघाट के चित्रण की क्या विशेषताएं हैं? (वार्ली चित्रकला)
- स्थान: महाराष्ट्र के सह्याद्रि पर्वतीय क्षेत्र की वार्ली जनजाति द्वारा निर्मित।
- ज्यामितीय आकृतियां: चित्र केवल तीन मूल ज्यामितीय आकृतियों से बनते हैं - त्रिभुज (मानव धड़), वृत्त (सिर) और रेखाएं (हाथ-पैर)।
- सामग्री: गाय के गोबर और गेरू से लीपी गई भूरी-लाल मिट्टी की दीवार पर सफेद चावल के पेस्ट (चावल का आटा + पानी) से चित्र बनाए जाते हैं।
- देवी पालघाट: उर्वरता और विवाह की देवी, जो प्रत्येक विवाह चित्र के केंद्र में एक चौकोर कोष्ठक (चौक) के भीतर बनाई जाती हैं।
- विषय: दैनिक सामाजिक जीवन - जैसे सामूहिक नृत्य (तारपा नृत्य), खेती, कटाई, शिकार और घरेलू उत्सव (भीमबेटका के शैल चित्रों जैसी सादगी)।
आंध्र प्रदेश की कलमकारी (Kalamkari) कला के दो प्रमुख शैलियों - श्रीकालहस्ती और मछलीपट्टनम में प्रयुक्त होने वाले प्राकृतिक रंगों और कलम माध्यम का क्या अंतर है? (कलमकारी चित्रकला)
- अर्थ: 'कलम' (Pen) + 'कारी' (Craftsmanship) - कपड़े पर कलम से की गई चित्रकारी।
- सामग्री: सूती कपड़े पर प्राकृतिक वनस्पतियों और खनिजों से बने रंगों का उपयोग (जैसे लोहे के बुरादे और गुड़ से काली स्याही)।
- श्रीकालहस्ती शैली (चित्तूर जिला):
- विशेषता: पूरी तरह से बाँस की नुकीली कलम (Bamboo Pen) से हाथ से चित्र बनाए जाते हैं।
- विषय: हिंदू महाकाव्य (रामायण, महाभारत, पुराण) और देवी-देवताओं के चित्र।
- मछलीपट्टनम शैली (कृष्णा जिला):
- विशेषता: चित्रों की रूपरेखा और डिजाइनों को लकड़ी के ब्लॉकों (Wooden Blocks) से कपड़े पर छापा जाता है, और रंगों को हाथ से भरा जाता है।
- विषय: फूल-पत्तियां, मयूर और ज्यामितीय बेल-बूटे (फारसी प्रभाव)।
मध्य प्रदेश की गोंड कला के बिंदुओं व रेखाओं के जटिल पैटर्न तथा ओडिशा की सौरा (Saura) कला की वार्ली जैसी ज्यामितीय शैली का क्या विवरण है? (गोंड और सौरा कला)
- गोंड चित्रकला (मध्य प्रदेश):
- विशेषता: पूरी सतह को छोटे-छोटे बिंदुओं (Dots) और सूक्ष्म रेखाओं (Dashes) के जटिल पैटर्नों से भरा जाता है, जिससे चित्रों में एक गत्यात्मकता का अहसास होता है।
- विषय: प्रकृति, स्थानीय पेड़-पौधे (जैसे सजीला वृक्ष) और गोंड लोककथाओं के पशु-पक्षी।
- प्रसिद्ध कलाकार: जंगढ़ सिंह श्याम, जिन्होंने इस पारंपरिक आदिवासी कला को वैश्विक कैनवास पर पहचान दिलाई।
- सौरा चित्रकला (ओडिशा):
- विशेषता: यह महाराष्ट्र की वार्ली कला से अत्यधिक मेल खाती है, लेकिन इसके पात्र वार्ली की तुलना में थोड़े अधिक स्पष्ट और भरे हुए होते हैं।
- विषय: पूर्वजों की पूजा, खेती के त्योहार और घर की दीवारों पर सुख-समृद्धि लाने वाले चित्र (इकोन/Idital)।
राजस्थान की फड़ (Phad) चित्रकला के लंबे सूती कपड़े के स्क्रॉल, लोक देवताओं (पाबूजी व देवनारायण) के महाकाव्यों और भोपा-भोपी कथावाचक परंपरा का क्या महत्व है? (फड़ चित्रकला)
- स्थान: राजस्थान के भीलवाड़ा जिले की पारंपरिक लोक कला।
- माध्यम: 15 से 30 फीट लंबे सूती कपड़े के स्क्रॉल (फड़) पर प्राकृतिक रंगों से बनाई जाने वाली सघन कथात्मक चित्रकारी।
- विषय: राजस्थान के स्थानीय लोक देवताओं - पाबूजी और देवनारायण के वीरतापूर्ण कारनामों का अंकन।
- कथावाचक परंपरा:
- भोपा और भोपी (पारंपरिक गायक पुजारी दंपत्ति) इस फड़ को रात में गाँवों में लेकर जाते हैं।
- भोपा रावणहत्था या जंतर वाद्य यंत्र बजाते हुए गाता है और लालटेन की रोशनी में फड़ पर बने चित्रों की ओर इशारा करता है, जबकि भोपी नृत्य करती है और कहानी की व्याख्या करती है।
सिक्किम, हिमाचल और लद्दाख के बौद्ध मठों में प्रयुक्त होने वाली थांगका (Thangka) चित्रकला के माध्यम, मंडल (Mandala) प्रतीकों और ध्यान में इसके उपयोग का क्या विवरण है? (थांगका चित्रकला)
- क्षेत्र: तिब्बती बौद्ध संस्कृति से प्रभावित क्षेत्र - जैसे सिक्किम, लद्दाख, हिमाचल प्रदेश (लाहौल-स्पीति)।
- माध्यम: सूती या रेशमी कैनवास पर खनिज रंगों से बनाए जाने वाले पोर्टेबल स्क्रॉल चित्र।
- विषय: बुद्ध, बोधिसत्वों के जीवन चक्र, भिक्षु और जटिल मंडल (Mandala) चक्र जो ब्रह्मांड की संरचना को दर्शाते हैं।
- धार्मिक व ध्यान उपयोग: ये चित्र मठों की दीवारों पर लटकाए जाते हैं और भिक्षुओं द्वारा ध्यान (Meditation) केंद्रित करने तथा आध्यात्मिक शिक्षा देने के लिए प्रयुक्त होते हैं।
बिहार के भागलपुर (अंग महाजनपद) की मंजूषा (Manjusha) चित्रकला के सांप रूपांकनों, तीन प्राथमिक रंगों (हरा, पीला, गुलाबी) और बिहुला-विषहरी लोककथा का क्या महत्व है? (मंजूषा चित्रकला)
- स्थान: बिहार के भागलपुर (अंग क्षेत्र) की लोक कला। इसे 'सर्प चित्रकला' (Snake Painting) भी कहा जाता है।
- बिहुला-विषहरी लोककथा: यह पूरी कला बिहुला नामक महिला की कहानी पर आधारित है जिसने अपने पति की जान सांप काटने से बचाने के लिए विषहरी (सांपों की देवी) की पूजा की थी।
- रंगों का प्रतिबंध: इस कला में केवल तीन रंगों का ही उपयोग किया जाता है - हरा, पीला और गुलाबी।
- माध्यम: पारंपरिक रूप से जूट और कागज के बक्सों (मंजूषा) पर चित्र बनाए जाते थे, जिनका उपयोग अनुष्ठानों में होता था।
कोलकाता के कालीघाट मंदिर के निकट उत्पन्न कालीघाट (Kalighat) चित्रकला के गहरे ब्रश स्ट्रोक, सामाजिक व्यंग्य और आधुनिक भारतीय कला पर इसके प्रभाव का क्या विवरण है? (कालीघाट चित्रकला)
- स्थान: 19वीं सदी में कोलकाता के प्रसिद्ध कालीघाट मंदिर के आसपास ग्रामीण पटुआ (चित्रकारों) द्वारा विकसित।
- माध्यम: सस्ते मिल-निर्मित कागज़ पर जलरंगों और ब्रश के मोटे व घुमावदार स्ट्रोक्स से बनाए जाने वाले चित्र।
- विषय:
- धार्मिक: देवी काली, शिव और अन्य देवताओं के चित्र।
- सामाजिक व्यंग्य: अंग्रेजी बाबू संस्कृति पर कटाक्ष, अमीर बंगाली बाबू की फुहड़ जीवन शैली और घरेलू झगड़ों का मज़ाकिया चित्रण।
- महत्व: इसकी सरल रेखाओं और चमकीले रंगों ने जामिनी रॉय जैसे कई आधुनिक भारतीय कलाकारों को प्रभावित किया।
तेलंगाना की चेरियाल स्क्रॉल (Cheriyal Scroll) चित्रकला की कॉमिक-स्ट्रिप कहानी शैली, नकाशी कला और लोक कथाओं के गायन का क्या विवरण है? (चेरियाल स्क्रॉल)
- स्थान: तेलंगाना का वारंगल जिला।
- कॉमिक-स्ट्रिप शैली: यह एक लंबी कपड़े की स्क्रॉल (लगभग 40-50 फीट लंबी) होती है, जिसे छोटे-छोटे चौकोर खानों (Panels) में विभाजित करके कॉमिक बुक की तरह कहानियों को क्रमिक रूप से दर्शाया जाता है।
- विषय: रामायण, महाभारत और स्थानीय लोक कथाओं के दृश्य।
- नकाशी कला: इसे नकाशी परिवार के कलाकारों द्वारा ही संरक्षित रखा गया है। इसे प्रदर्शित करते समय लोक गायक कहानियों को गाकर सुनाते हैं।
- जीआई टैग: 2007 में प्राप्त हुआ।
गुजरात की पिथोरा (Pithora) अनुष्ठानिक कला और गुजरात के भुज के रोगन (Rogan) कला के अरंडी तेल माध्यम व उसके वर्तमान संरक्षण संकट की क्या विशेषताएं हैं? (पिथोरा और रोगन कला)
- पिथोरा कला: गुजरात के छोटा उदयपुर और मध्य प्रदेश के झाबुआ क्षेत्र की राठवा व भीलाला जनजातियों द्वारा घर की दीवारों पर मन्नत पूरी होने के आभार के रूप में बनाई जाने वाली चित्रकला। इसमें घोड़ों का चित्रण अनिवार्य और सबसे महत्वपूर्ण होता है।
- रोगन कला:
- तकनीक: उबले हुए अरंडी के तेल (Castor Oil) और प्राकृतिक रंजकों को मिलाकर एक गाढ़ा पेस्ट बनाया जाता है, जिससे सूती कपड़े पर धातु की सलाई (Stylus) की मदद से बिना किसी पहले खींचे गए स्केच के बारीक ज्यामितीय फूल-पत्तियों के डिजाइन बनाए जाते हैं।
- संरक्षण संकट: यह कला वर्तमान में केवल गुजरात के कच्छ जिले के निरोणा गाँव में खत्री परिवार के कुछ ही सदस्यों द्वारा जीवित रखी गई है।
भारत की किन प्रमुख पारंपरिक चित्रकला शैलियों को भौगोलिक संकेतक (GI Tag) प्राप्त है और यह उनके संरक्षण में कैसे मदद करता है? (जीआई टैग चित्रकला)
- जीआई टैग प्राप्त शैलियाँ:
- मधुबनी चित्रकला (बिहार)
- ओडिशा पट्टचित्र (ओडिशा)
- श्रीकालहस्ती और मछलीपट्टनम कलमकारी (आंध्र प्रदेश)
- चेरियाल स्क्रॉल पेंटिंग (तेलंगाना)
- कांगड़ा पेंटिंग (हिमाचल प्रदेश)
- मैसूर पेंटिंग और तंजौर पेंटिंग
- महत्व: यह इन पारंपरिक कलाओं की प्रामाणिकता को कानूनी सुरक्षा प्रदान करता है, जिससे नकली और मशीनी कॉपियों की बिक्री रुकती है और कलाकारों को उचित मूल्य प्राप्त होता है।
आधुनिक भारतीय कला
स्वदेशी आंदोलन के दौरान ब्रिटिश अकादमिक कला के विरोध में अबनींद्रनाथ टैगोर द्वारा स्थापित बंगाल शैली के राष्ट्रवादी दर्शन और जापानी वॉश तकनीक का क्या महत्व है? (बंगाल शैली पुनरुद्धार)
- ब्रिटिश अकादमिक कला का विरोध: राजा रवि वर्मा जैसे कलाकारों की तेल चित्रकला (Oil Painting) और पश्चिमी यथार्थवाद (Western Realism) को बंगाल शैली ने खारिज कर दिया। उनका मानना था कि पश्चिमी तकनीकें भारतीय अध्यात्म और आत्मा को व्यक्त नहीं कर सकतीं।
- जापानी वॉश तकनीक (Wash Technique): अबनींद्रनाथ टैगोर ने जापानी कलाकारों (जैसे ओकाकुरा काकूजो) से प्रभावित होकर 'वॉश तकनीक' को अपनाया, जिसमें रंगों की पतली और धुंधली परतें चढ़ाई जाती थीं, जिससे चित्रों में एक रहस्यमयी और आध्यात्मिक आभा पैदा होती थी।
- स्वदेशी आंदोलन: 1905 के बंगाल विभाजन के समय यह शैली पूरी तरह स्वदेशी और राष्ट्रवादी कला आंदोलन के रूप में उभरी, जिसने भारतीय लघुचित्रों (मुगल-राजपूत) और अजंता की शैली को पुनर्जीवित किया।
- भारत माता (1905): अबनींद्रनाथ टैगोर का सबसे प्रसिद्ध चित्र, जिसमें भारत माता को एक शांत, केसरिया वस्त्र पहने चार हाथों वाली संन्यासी देवी के रूप में दर्शाया गया है जो अन्न, वस्त्र, ज्ञान और माला धारण किए हुए हैं।
नंदलाल बोस द्वारा संविधान की मूल प्रति के रेखांकन, हरिपुरा कांग्रेस पोस्टरों और जामिनी रॉय की लोक कला से प्रभावित शैली का क्या महत्व है? (नंदलाल बोस व जामिनी रॉय)
- नंदलाल बोस:
- अबनींद्रनाथ टैगोर के सबसे प्रिय शिष्य।
- संविधान का चित्रण: उन्होंने भारतीय संविधान की मूल हस्तलिखित प्रति के सभी 22 भागों के शीर्षों पर भारत के ऐतिहासिक कालक्रम (हड़प्पा से लेकर स्वतंत्रता संग्राम तक) के सुंदर चित्र बनाए।
- हरिपुरा पोस्टर्स: 1938 के हरिपुरा कांग्रेस अधिवेशन के लिए महात्मा गांधी के अनुरोध पर स्थानीय देहाती विषयों (जैसे किसान, शिल्पकार, गृहणी) पर आधारित पोस्टरों की एक श्रृंखला बनाई।
- जामिनी रॉय:
- उन्होंने बंगाल की पारंपरिक कालीघाट लोक कला और संथाल आदिवासी कला से प्रेरणा ली।
- शैली: उन्होंने जटिल यूरोपीय तैल चित्रकला को छोड़कर साधारण रेखाओं, दो-आयामी आकृतियों और चमकीले प्राकृतिक रंगों से ग्रामीण आम जनता की कला को पुनर्जीवित किया।
वात्स्यायन के कामसूत्र में वर्णित चित्रकला के छह अंगों - रूपभेद, प्रमाणम्, भाव, लावण्य योजना, सादृश्यम्, और वर्णिकाभंग के क्या अर्थ हैं? (चित्रकला के षडंग)
- षडंग (Six Limbs of Painting):
- रूपभेद: आकृतियों और रूपों की विभिन्नता का ज्ञान।
- प्रमाणम्: सही अनुपात, माप और परिप्रेक्ष्य (Symmetry and Proportion)।
- भाव: चेहरे और शारीरिक मुद्रा में भावनाओं की अभिव्यक्ति (Emotion/Expression)।
- लावण्य योजना: कलात्मक सौंदर्य, कृपा और तरलता का प्रस्तुतीकरण।
- सादृश्यम्: वास्तविकता या विषय के साथ समानता और सदृशता।
- वर्णिकाभंग: रंगों और ब्रुश/तूलिका के सही उपयोग का ज्ञान (Color coordination and technique)।
1947 में बॉम्बे में स्थापित प्रगतिशील कलाकार समूह (Progressive Artists' Group) के संस्थापक सदस्यों (एफ.एन. सूजा, एस.एच. रजा, एम.एफ. हुसैन) और उनके कलात्मक दृष्टिकोण का विवरण क्या है? (प्रगतिशील कलाकार समूह)
- स्थापना: 1947 में देश के विभाजन और स्वतंत्रता के समय बॉम्बे में युवा कलाकारों द्वारा स्थापित।
- संस्थापक सदस्य: एफ.एन. सूजा (फ्रांसिस न्यूटन सूजा - सचिव), एस.एच. रजा (सैयद हैदर रजा), एम.एफ. हुसैन (मकबूल फिदा हुसैन), वी.एस. गायतोंडे और के.एच. आरा।
- दृष्टिकोण:
- उन्होंने बंगाल स्कूल के राष्ट्रवादी पुनरुद्धारवाद और ब्रिटिश अकादमिक यथार्थवाद दोनों को खारिज कर दिया।
- वे भारतीय लोक व शास्त्रीय विषयों को पश्चिमी आधुनिकतावाद (जैसे अमूर्त कला, घनवाद/Cubism और अभिव्यक्तिवाद/Expressionism) के साथ जोड़कर एक नई अंतरराष्ट्रीय भारतीय कला बनाना चाहते थे।
- एस.एच. रजा: अपने ज्यामितीय अमूर्त चित्रों और 'बिंदु' (Bindu) दर्शन के लिए विश्व प्रसिद्ध हुए।
- एम.एफ. हुसैन: घोड़ों के चित्र और भारतीय पौराणिक कथाओं के आधुनिक चित्रों के लिए जाने गए।
लोक एवं पारंपरिक चित्रकला (संपूर्ण)
केरल की अनुष्ठानिक भूमि चित्रकला 'कालम एज़ुथु' (Kalam Ezhuthu) और केरल के मंदिरों व महलों (जैसे मट्टनचेरी पैलेस) के भित्तिचित्रों का क्या महत्व है? (केरल भित्तिचित्र और कालम एज़ुथु)
- कालम एज़ुथु: केरल के मंदिरों के फर्श पर पाँच प्राकृतिक रंगों (सफेद, काला, पीला, लाल, हरा) के सूखे पाउडर से बनाई जाने वाली देवी काली या वेत्तक्कोरुकन (शिकारी भगवान) की विशाल अनुष्ठानिक आकृतियाँ। पूजा के बाद इसे तुरंत मिटा दिया जाता है।
- केरल भित्तिचित्र (Mural Paintings): 16वीं-18वीं सदी के दौरान केरल के मंदिरों और कोच्चि के मट्टनचेरी पैलेस (डच पैलेस) की दीवारों पर बने चित्र।
- विशेषताएं: इनमें आकृतियों को अत्यधिक गोल, मांसल और अलंकृत मुकुट पहने दर्शाया गया है।
- रंग: गेरूआ लाल, पीला, हरा और सफेद रंगों का प्रमुख उपयोग।
कर्नाटक की बादामी (Badami) गुफाओं में चालुक्य राजवंश के अधीन निर्मित हिंदू चित्रकला के प्राचीनतम जीवित अवशेषों की क्या विशेषताएं हैं? (बादामी गुफा चित्र)
- स्थान और काल: कर्नाटक के बागलकोट जिले में स्थित शैलकट गुफाएं (6वीं शताब्दी ई.)।
- चालुक्य संरक्षण: चालुक्य राजा मंगलेश (कीर्तिवर्मन प्रथम के भाई) द्वारा गुफा संख्या 4 (वैष्णव गुफा) में चित्रों का निर्माण करवाया गया।
- महत्व: यह भारत में हिंदू मंदिरों व देवताओं (जैसे भगवान शिव, पार्वती और दरबारी दृश्यों) से संबंधित चित्रकला के सबसे प्राचीनतम प्रमाणित भित्तिचित्र अवशेष हैं।
- कलात्मकता: अजंता की शास्त्रीय परंपरा की निरंतरता दिखती है, जिसमें चेहरों की नक्काशी अधिक स्पष्ट है।
आंध्र प्रदेश के अनंतपुर जिले में स्थित लेपाक्षी (Lepakshi) वीरभद्र मंदिर के विजयनगर साम्राज्य कालीन चित्रों और उनकी कोणीय शैली की क्या विशेषताएं हैं? (लेपाक्षी मंदिर चित्र)
- स्थान: वीरभद्र मंदिर, लेपाक्षी, आंध्र प्रदेश।
- काल: 16वीं शताब्दी (विजयनगर साम्राज्य के वीरन्ना और विरुपन्ना भाइयों के संरक्षण में)।
- विशेषताएं:
- चित्रों में आकृतियों को बहुत कोणीय (Angular) बनाया गया है और उनके चेहरे केवल पार्श्व प्रोफ़ाइल (Side View) में दिखाए गए हैं।
- कपड़ों के डिजाइनों और सिलवटों पर अधिक जोर दिया गया है।
- प्रसिद्ध चित्र: छत पर बना शिव के चौदह अवतारों का चित्र और विशाल वीरभद्र की आकृति (जो भारत का सबसे बड़ा छत चित्र माना जाता है)।
विजयनगर सम्राट कृष्णदेवराय और उनकी दो रानियों (चिन्नादेवी और तिरुमलादेवी) की तिरुपति के वेंकटेश्वर मंदिर में स्थापित आदमकद कांस्य प्रतिमा की क्या ऐतिहासिक विशेषताएं हैं? (कृष्णदेवराय कांस्य प्रतिमा)
- स्थान: तिरुमला वेंकटेश्वर मंदिर, तिरुपति (आंध्र प्रदेश) के प्रवेश द्वार के पास।
- कांस्य प्रतिमा: विजयनगर के महान राजा कृष्णदेवराय और उनकी दो रानियों (चिन्नादेवी और तिरुमलादेवी) की हाथ जोड़े प्रार्थना की मुद्रा में खड़ी आदमकद कांस्य मूर्तियाँ।
- महत्व: यह विजयनगर साम्राज्य की धातु ढलाई कला का सर्वोच्च उदाहरण है और राजा की अत्यधिक धार्मिक विनम्रता व संरक्षण को दर्शाता है।
ताम्रपाषाण काल (Chalcolithic Period) में बने साधारण, चित्रित लाल व काले और छिद्रित मृदभांडों (Pottery) की उपयोगिता तथा जोर्वे व इनामगाँव जैसे स्थलों का क्या महत्व है? (ताम्रपाषाण मृदभांड कला)
- मृदभांडों के प्रकार:
- चित्रित लाल और काले मृदभांड (Black and Red Ware): लाल पृष्ठभूमि पर काले रंग से ज्यामितीय आकृतियों, तरंगों और पशुओं के चित्र बनाए जाते थे।
- छिद्रित मृदभांड (Perforated Pottery): तली में छिद्र वाले बर्तन जिनका उपयोग शायद पेय पदार्थों (जैसे मदिरा या बियर) को छानने के लिए किया जाता था।
- प्रमुख ताम्रपाषाण कालीन स्थल:
- जोर्वे संस्कृति (महाराष्ट्र): इनामगाँव, दैमाबाद, नेवासा और नासिक।
- विशेषता: यहाँ चाक निर्मित लाल-नारंगी रंग के मृदभांड मिले हैं जिन पर धातु की खनक जैसी आवाज आती थी।
सिंधु घाटी कला
मोहनजोदड़ो से प्राप्त प्रसिद्ध 'नृत्यांगना' (Dancing Girl) की कांस्य मूर्ति के निर्माण में प्रयुक्त 'लॉस्ट-वैक्स' (Lost-wax/Cire Perdue) तकनीक की क्या विशेषताएं हैं? (IVC कांस्य मूर्तिकला)
- नृत्यांगना की मूर्ति: मोहनजोदड़ो से प्राप्त लगभग 10.5 सेमी ऊंची कांस्य की नग्न मूर्ति, जो त्रिभंग मुद्रा (तीन झुकावों वाली खड़े होने की शैली) में है। उसने अपने बाएं हाथ में चूड़ियाँ पहन रखी हैं और दाहिना हाथ कूल्हे पर टिका है।
- लॉस्ट-वैक्स (Cire Perdue) तकनीक:
- पहले मोम (Wax) की एक मूर्ति बनाई जाती थी, जिसे चिकनी मिट्टी से पूरी तरह ढक दिया जाता था।
- मिट्टी के सूखने के बाद उसे गर्म किया जाता था जिससे अंदर का मोम पिघलकर एक छोटे छेद के रास्ते बाहर निकल जाता था (लुप्त मोम)।
- फिर उस खाली सांचे में पिघला हुआ कांस्य (तांबा + टिन) भरा जाता था। ठंडा होने पर बाहरी मिट्टी को तोड़ दिया जाता था, जिससे धातु की मूर्ति प्राप्त होती थी।
मोहनजोदड़ो से प्राप्त 'दाढ़ी वाले पुजारी' (Bearded Priest) की स्टीटाइट मूर्ति और आम जनता द्वारा पूजी जाने वाली टेराकोटा की 'मातृदेवी' (Mother Goddess) मूर्तियों की क्या विशेषताएं हैं? (IVC पत्थर व टेराकोटा मूर्तियाँ)
- दाढ़ी वाले पुजारी (Bearded Priest):
- मोहनजोदड़ो से प्राप्त स्टीटाइट (साबुन का पत्थर) की एक छोटी आवक्ष मूर्ति (Bust)।
- विशेषताएं: इसने बाएं कंधे पर तीन पत्तियों के डिजाइन (Trefoil Pattern) वाली शॉल ओढ़ रखी है। आँखें आधी बंद हैं जैसे ध्यान की मुद्रा में हों। दाढ़ी को बहुत साफ-सुथरे ढंग से तराशा गया है।
- मातृदेवी (Mother Goddess):
- पकी हुई मिट्टी (Terracotta) से हाथ से बनाई गई छोटी नारी आकृतियां।
- विशेषताएं: सिर पर एक पंखेनुमा मुकुट (Fan-shaped head-dress) है, और गले में कई आभूषण पहने हुए हैं। यह अत्यधिक प्रचुरता में मिली हैं जो समाज की मातृ-सत्तात्मक और प्रकृति पूजा की प्रवृत्ति को दर्शाती हैं।
स्टेटाइट (Steatite) से बनी सिंधु घाटी की मुहरों पर पशुओं (एक सींग वाला गेंडा, कूबड़ वाला सांड) के अंकन, पशुपति महादेव मुहर और मंदिरों की अनुपस्थिति का क्या विवरण है? (IVC मुहरें और धार्मिक कला)
- मुहरों का निर्माण: अधिकांश मुहरें चौकोर या आयताकार हैं जो स्टीटाइट (मुलायम नदी पत्थर) से बनी हैं। इन पर ऊपर की ओर सिंधु लिपि उत्कीर्ण है और नीचे पशुओं के चित्र हैं।
- पशुपति महादेव मुहर: मोहनजोदड़ो से प्राप्त मुहर जिसमें एक त्रि-मुखी पुरुष देवता योग मुद्रा में बैठे हैं, जिनके सिर पर सींग हैं। वे हाथियों, बाघों, गैंडों और भैंसों से घिरे हैं, तथा चरणों में दो हिरण हैं। इसे भगवान शिव का प्रारंभिक रूप माना जाता है।
- पशु अंकन: सबसे लोकप्रिय पशु एक सींग वाला गेंडा (Unicorn) था, जिसके बाद कूबड़ वाला सांड (Humped Bull) का स्थान था।
- धार्मिक स्वरूप: पूरी सभ्यता में कोई मंदिर या सार्वजनिक पूजा स्थल नहीं मिला है। पूजा पूरी तरह व्यक्तिगत और प्रकृति-केंद्रित (वृक्षों, पशुओं, जल) थी।
जैन तीर्थ स्थल
गुजरात के शतरुंजय पहाड़ियों पर स्थित पालिताना (Palitana) जैन मंदिरों के श्वेतांबर संप्रदाय के महत्व और जूनागढ़ के गिरनार (Girnar) तीर्थ स्थल का क्या विवरण है? (पालिताना और गिरनार जैन स्थल)
- पालिताना: गुजरात के भावनगर जिले में शतरुंजय पहाड़ी (Shatrunjaya Hills) पर स्थित 863 जैन मंदिरों का विशाल समूह।
- संप्रदाय: श्वेतांबर संप्रदाय का सबसे पवित्र तीर्थ। यह प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ (ऋषभदेव) से संबंधित है।
- विशेषता: सूर्यास्त के बाद किसी भी मनुष्य (पुजारी सहित) को पहाड़ी पर रुकने की अनुमति नहीं होती, यह केवल देवताओं का शहर माना जाता है।
- गिरनार: जूनागढ़ में स्थित पहाड़ी, जो 22वें तीर्थंकर नेमिनाथ के मोक्ष स्थल के रूप में जानी जाती है। यहाँ हिंदू और जैन दोनों के प्राचीन मंदिर हैं।
झारखंड के पारसनाथ पहाड़ी पर स्थित सम्मेद शिखरजी (Shikharji) और बिहार के पावापुरी (Pavapuri - जहाँ भगवान महावीर को मोक्ष मिला) का जैन धर्म में क्या महत्व है? (शिखरजी और पावापुरी)
- सम्मेद शिखरजी: झारखंड के गिरिडीह जिले में पारसनाथ पहाड़ी पर स्थित। जैन धर्म का सबसे महत्वपूर्ण तीर्थ माना जाता है क्योंकि जैन मान्यता के अनुसार 24 में से 20 तीर्थंकरों ने इसी पहाड़ी पर तपस्या करके मोक्ष (निर्वाण) प्राप्त किया था।
- पावापुरी: बिहार के नालंदा जिले के पास स्थित। यहाँ जैन धर्म के 24वें और अंतिम तीर्थंकर भगवान महावीर ने निर्वाण प्राप्त किया था। उनके दाह संस्कार स्थल पर जल के बीच एक सुंदर मंदिर बना है जिसे 'जल मंदिर' (Water Temple) कहते हैं।
राजस्थान के माउंट आबू में स्थित दिलवाड़ा (Dilwara) जैन मंदिरों की संगमरमर की बारीक नक्काशी, लूणा वसही और विमल वसही मंदिरों की क्या स्थापत्य विशेषताएं हैं? (दिलवाड़ा जैन मंदिर)
- स्थान: राजस्थान की अरावली पहाड़ियों में स्थित माउंट आबू।
- निर्माण: 11वीं से 13वीं शताब्दी के बीच सोलंकी राजाओं के मंत्रियों (विमल शाह और वस्तुपाल-तेजपाल) द्वारा निर्मित।
- संगमरमर की जादुई नक्काशी: बाहर से सादे दिखने वाले ये मंदिर अंदर से सफेद संगमरमर की ऐसी महीन नक्काशी से सुसज्जित हैं जो दुनिया में कहीं और नहीं देखी जाती (जैसे छतों पर लटकते हुए संगमरमर के झूमर)।
- प्रमुख मंदिर:
- विमल वसही: प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ को समर्पित (सबसे पुराना)।
- लूणा वसही: 22वें तीर्थंकर नेमिनाथ को समर्पित, जिसकी छत की बारीक नक्काशी प्रसिद्ध है।
कर्नाटक के श्रवणबेलगोला (Shravanabelagola) में विंध्यगिरि पहाड़ी पर स्थित गोमटेश्वर (बाहुबली) की 57 फीट ऊंची एकाश्म प्रतिमा और प्रत्येक 12 वर्ष में होने वाले महामस्तकाभिषेक का क्या महत्व है? (श्रवणबेलगोला बाहुबली प्रतिमा)
- स्थान: हासन जिला, कर्नाटक।
- गोमटेश्वर (बाहुबली) प्रतिमा: प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव के पुत्र बाहुबली की 57 फीट ऊंची विशाल प्रतिमा, जिसे 981 ई. में गंगा राजवंश के मंत्री चामुंडराय ने बनवाया था। यह दुनिया की सबसे ऊंची स्वतंत्र एकाश्म खड़ी (कायोत्सर्ग मुद्रा) प्रतिमाओं में से एक है।
- महामस्तकाभिषेक: प्रत्येक 12 वर्ष में होने वाला एक विशाल जैन उत्सव, जिसमें प्रतिमा का दूध, घी, गन्ने के रस, केसर और सोने के सिक्कों से अभिषेक किया जाता है।
जैन परंपरा में प्रयुक्त होने वाले शब्द 'बसदि' (Basadi) और मथुरा के कंकाली टीला से प्राप्त पूजा पट्टिका 'आयागपट' (Ayagapatta) का क्या अर्थ व इतिहास है? (बसदि और आयागपट)
- बसदि (Basadi): दक्षिण भारत (विशेषकर कर्नाटक) में जैन मंदिरों और जैन भिक्षुओं के रहने के मठों को 'बसदि' कहा जाता है।
- आयागपट (Ayagapatta): कुषाण काल में मथुरा के कंकाली टीला से प्राप्त पत्थर की चौकोर पट्टियाँ जिन पर जैन तीर्थंकरों की मूर्तियाँ या मांगलिक चिह्न (जैसे स्वस्तिक) खुदे होते थे। श्रद्धालु इन पट्टिकाओं को मंदिर में पूजा और दान के संकल्प के रूप में अर्पित करते थे।
ओडिशा में स्थित उदयगिरि और खंडगिरि (Udayagiri-Khandagiri) की जैन गुफाओं, रानीगुम्फा और कलिंग राजा खारवेल के हाथीगुम्फा शिलालेख का क्या ऐतिहासिक महत्व है? (उदयगिरि-खंडगिरि गुफाएं)
- स्थान: भुवनेश्वर के पास, ओडिशा। ई.पू. दूसरी-पहली शताब्दी में निर्मित गुफाएं।
- संरक्षक: कलिंग के चेदि राजवंश के प्रसिद्ध राजा खारवेल।
- हाथीगुम्फा शिलालेख: खारवेल द्वारा प्राकृत भाषा और ब्राह्मी लिपि में उत्कीर्ण कराया गया शिलालेख, जो मौर्य काल के बाद कलिंग के इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण स्रोत है।
- रानीगुम्फा: उदयगिरि की सबसे बड़ी और दो मंजिला गुफा, जिस पर जैन भिक्षुओं के जीवन और युद्धों के दृश्य खुदे हैं।
मध्य प्रदेश के बावनगजा, राजस्थान के राणकपुर (1444 नक्काशीदार खंभे) और महाराष्ट्र के मांगी-तुंगी में स्थापित विश्व की सबसे ऊंची जैन प्रतिमा 'अहिंसा की प्रतिमा' का क्या विवरण है? (अन्य प्रसिद्ध जैन तीर्थ स्थल)
- राणकपुर मंदिर (राजस्थान): अरावली की घाटियों में स्थित ऋषभदेव का मंदिर। यह अपने 1444 नक्काशीदार संगमरमर के खंभों के लिए प्रसिद्ध है, जिनमें से कोई भी दो खंभे एक जैसे नहीं हैं।
- मांगी-तुंगी (महाराष्ट्र): नासिक जिले में स्थित दो पहाड़ियाँ। यहाँ 2016 में 22वें तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव की 108 फीट ऊंची विशाल कायोत्सर्ग प्रतिमा तराशी गई, जिसे 'अहिंसा की प्रतिमा' (Statue of Ahimsa) कहा जाता है। यह विश्व की सबसे ऊंची जैन एकाश्म प्रतिमा है।
- बावनगजा (मध्य प्रदेश): बड़वानी जिले में स्थित आदिनाथ की 84 फीट (52 हाथ - बावन गज) ऊंची शैलकट प्रतिमा।
मंदिर वास्तुकला शब्दावली
नागर शैली के रेखा-प्रसाद (Latina), सीढ़ीदार फांसना (Phamsana) और ढोलकनुमा वलभी (Valabhi) शिखरों की संरचनात्मक बनावट और उनके उदाहरण क्या हैं? (शिखर प्रकार विवरण)
- रेखा-प्रसाद / लतीना: नागर शैली का सबसे मूल शिखर जो वर्गाकार आधार से शुरू होकर ऊपर की ओर झुकी हुई रेखाओं में मिलते हुए एक बिंदु पर समाप्त होता है। उदाहरण: भुवनेश्वर का लिंगराज मंदिर।
- फांसना: यह शिखर लतीना की तुलना में अधिक चौड़ा और छोटा होता है। इसकी छत ऊपर की ओर ढलान वाली पट्टियों से बनी होती है। इसका उपयोग प्रायः मंदिर के मंडप की छत बनाने के लिए होता था।
- वलभी: आयताकार आधार वाला शिखर जिसकी छत एक अर्ध-सिलेंडर या ढोलक के आकार की (Wagon-vaulted) होती है। इसका विकास बौद्ध चैत्य गृहों की छत की नकल से हुआ था। उदाहरण: ग्वालियर का तेली का मंदिर।
कला शैलियां
कुषाण काल में विकसित मथुरा कला शैली (Mathura School of Art) के विकास, लाल चित्तीदार बलुआ पत्थर के उपयोग और इसकी त्रि-धार्मिक (बौद्ध, हिंदू, जैन) विशेषताओं का क्या विवरण है? (मथुरा कला शैली)
- कुषाण कालीन विकास: यह शैली ईसा की पहली से तीसरी शताब्दी के दौरान मथुरा (उत्तर प्रदेश) में कुषाण राजाओं (जैसे कनिष्क) के संरक्षण में पूरी तरह स्वदेशी रूप से विकसित हुई।
- सामग्री: केवल सीकरी और रूपबास से प्राप्त लाल चित्तीदार बलुआ पत्थर (Spotted Red Sandstone) का उपयोग किया गया।
- त्रि-धार्मिक विशेषता: गांधार कला (जो केवल बौद्ध धर्म तक सीमित थी) के विपरीत, मथुरा शैली में तीनों धर्मों के चित्र बने:
- बौद्ध: बुद्ध की भारी, मांसल, हंसमुख और बिना मूंछों वाली मूर्तियाँ (दाहिना हाथ अभय मुद्रा में)।
- हिंदू: शिव (लिंग रूप और मानवीय रूप), कार्तिकेय, विष्णु और सूर्य की प्राचीनतम मूर्तियाँ।
- जैन: कंकाली टीला से प्राप्त तीर्थंकरों की मूर्तियाँ और आयागपट।
राज्य अनुसार लोक नृत्य (गणतंत्र दिवस 2019)
गणतंत्र दिवस 2019 में प्रदर्शित प्रमुख लोक नृत्यों जैसे तमिलनाडु के करकट्टम, महाराष्ट्र के ताकला, अरुणाचल के गुंगटे और उत्तराखंड के हुड़का छुड़का के राज्यों से संबंध का क्या विवरण है? (लोक नृत्य राज्य मानचित्रण)
- करकट्टम (Karakattam): तमिलनाडु का प्राचीन लोक नृत्य जो वर्षा की देवी मरिअम्मन की पूजा में सिर पर पानी का घड़ा (करकम) रखकर संतुलित करते हुए किया जाता है।
- ताकला (Takla): महाराष्ट्र का एक ऊर्जावान पारंपरिक लोक नृत्य।
- गुंगटे (Gungte): अरुणाचल प्रदेश की जनजातियों का पारंपरिक लोक नृत्य।
- हुड़का छुड़का (Hurka Chhurka): उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र में धान और मक्के की रोपाई के समय हुड़का (डमरू जैसा वाद्य यंत्र) बजाते हुए किया जाने वाला कृषि नृत्य।
- सतोइया नित्य: असम का लोक नृत्य।
- मामिटा (Mamita): त्रिपुरा का फसल कटाई नृत्य।
विदेशी यात्री कालक्रम
मौर्य काल के मेगस्थनीज (रचना: इंडिका) और गुप्त काल के चीनी बौद्ध यात्री फाह्यान (Faxian) के भारत आने का समय, शासक और उनके यात्रा विवरणों का क्या महत्व है? (प्राचीन काल के विदेशी यात्री)
- मेगस्थनीज (Megasthenes):
- काल: चौथी शताब्दी ई.पू. (~302 ई.पू.)।
- सम्राट: चंद्रगुप्त मौर्य के दरबार में यूनानी राजा सेल्यूकस निकेटर का राजदूत बनकर आया।
- रचना: 'इंडिका' (मूल प्रति खो चुकी है, लेकिन बाद के यूनानी लेखकों के उद्धरणों में जीवित है)। उसने पाटलिपुत्र के नगर प्रशासन और मौर्य समाज के 7 वर्गों में विभाजन का वर्णन किया।
- फाह्यान (Faxian):
- काल: 399-412 ई. (गुप्त काल)।
- सम्राट: चंद्रगुप्त द्वितीय (विक्रमादित्य) के शासनकाल में आया (हालाँकि उसने अपने पूरे यात्रा विवरण में राजा के नाम का उल्लेख नहीं किया)।
- उद्देश्य: बौद्ध ग्रंथों और विनय पिटक की प्रतियों को खोजना। उसने मध्य देश (गंगा घाटी) की शांति, अहिंसा और शाकाहार का वर्णन किया।
7वीं शताब्दी में राजा हर्षवर्धन के काल में आए ह्वेनसांग (रचना: सी-यू-की) और उसके बाद आए चीनी भिक्षु इत्सिंग (Yijing) की यात्राओं का क्या विवरण है? (चीनी यात्री ह्वेनसांग व इत्सिंग)
- ह्वेनसांग (Xuanzang):
- काल: 629-645 ई.।
- सम्राट: कन्नौज के राजा हर्षवर्धन के काल में आया। उसने नालंदा विश्वविद्यालय में बौद्ध दर्शन की पढ़ाई की और बाद में वहाँ पढ़ाया भी।
- रचना: 'सी-यू-की' (पश्चिमी दुनिया का रिकॉर्ड)। उसने हर्ष के दान उत्सव (प्रयाग की महामोक्षपरिषद) और भारत के तत्कालीन सामाजिक-आर्थिक जीवन का विस्तृत विवरण दिया। इसे 'यात्रियों का राजकुमार' कहा जाता है।
- इत्सिंग (Yijing):
- काल: 670-695 ई.।
- यात्रा: वह समुद्री मार्ग से भारत आया और नालंदा व विक्रमशिला विश्वविद्यालयों में लगभग 10 वर्षों तक रहा। उसने बौद्ध भिक्षुओं के नियमों और शिक्षा प्रणाली का विवरण दिया।
अलबरूनी (रचना: किताब-उल-हिंद), इब्न बतूता (रचना: रिह्ला), निकोलो कोंटी, डोमिंगो पेस और बर्नियर के भारत आगमन काल, तत्कालीन शासकों और उनकी कृतियों का क्या महत्व है? (मध्यकालीन विदेशी यात्री)
- अलबरूनी (Al-Biruni): 11वीं शताब्दी में महमूद गजनवी के साथ भारत आया। उसने संस्कृत सीखी और 'किताब-उल-हिंद' (तहरीक-ए-हिंद) लिखी, जो भारतीय विज्ञान, दर्शन और जाति व्यवस्था का पहला गंभीर मुस्लिम अध्ययन है।
- निकोलो कोंटी (Nicolo de' Conti): 1420-1421 में विजयनगर साम्राज्य (देवराय प्रथम के काल) में आने वाला पहला इतालवी यात्री।
- अब्दुल रज्जाक: 1442-1443 में फारस के शासक शाहरुख का दूत बनकर विजयनगर (देवराय द्वितीय के काल) आया। उसने विजयनगर के सात सुरक्षा घेरों और वैभव का वर्णन किया।
- इब्न बतूता (Ibn Battuta): 14वीं शताब्दी (1333 ई.) में मोरक्को से आया। मोहम्मद बिन तुगलक ने इसे दिल्ली का काजी नियुक्त किया। इसकी पुस्तक का नाम 'रिह्ला' है।
- डोमिंगो पेस (Domingo Paes): 1520-1522 में पुर्तगाली यात्री जो विजयनगर के महान राजा कृष्णदेवराय के दरबार में आया।
- फ्रांस्वा बर्नियर (Francois Bernier): 17वीं शताब्दी में आने वाला फ्रांसीसी चिकित्सक जो शाहजहां के पुत्र दारा शिकोह का चिकित्सक बना और बाद में औरंगजेब के संरक्षण में रहा।
ऐतिहासिक ग्रंथ और लेखक
राष्ट्रकूट काल के कन्नड़ काव्य के तीन रत्नों (पंपा, पोन्ना, रन्ना) और तेलुगु महाभारत की रचना करने वाले तीन कवियों (Nannaya, Tikkana, Erranna) के ऐतिहासिक ग्रंथों का क्या विवरण है? (कन्नड़ और तेलुगु साहित्य)
- कन्नड़ साहित्य के तीन रत्न (Three Gems of Kannada):
- आदिकवि पंपा: रचना - 'विक्रमार्जुन विजय' (कन्नड़ महाभारत) और 'आदिपुराण' (प्रथम जैन तीर्थंकर पर)।
- श्री पोन्ना: रचना - 'शांतिपुराण' (16वें तीर्थंकर शांतिनाथ पर)।
- रन्ना: रचना - 'अजीतपुराण' (दूसरे तीर्थंकर पर) और 'गदायुद्ध'।
- तेलुगु महाभारत के तीन कवि (Kavitrayam):
- नन्नय (Nannaya): 11वीं सदी में महाभारत का तेलुगु अनुवाद शुरू किया।
- तिक्कन (Tikkana): 13वीं सदी में इसके अधिकांश भाग को आगे बढ़ाया।
- एर्रन्ना (Erranna): 14वीं सदी में अरण्य पर्व को लिखकर इसे पूरा किया (कन्नड़ नहीं, विशुद्ध तेलुगु कवि थे)।
12वीं शताब्दी के महान गणितज्ञ भास्कर द्वितीय (Bhaskara II) द्वारा रचित 'सिद्धांत शिरोमणि' के चार भागों (लीलावती, बीजगणित, ग्रहगणित, गोलाध्याय) की विषय-वस्तु क्या है? (भास्कर द्वितीय की रचनाएं)
- सिद्धांत शिरोमणि: 1150 ई. में भास्कर द्वितीय द्वारा रचित खगोलशास्त्र और गणित का महान संस्कृत ग्रंथ। इसके चार भाग हैं:
- लीलावती: मुख्य रूप से अंकगणित (Arithmetic), ज्यामिति (Geometry) और क्रमपरिवर्तन-संयोजन (Permutations) का ग्रंथ। यह उन्होंने अपनी पुत्री लीलावती को संबोधित करके सरल पहेलियों के रूप में लिखा था।
- बीजगणित: उन्नत बीजगणित (Algebra) और अनिर्णय समीकरणों (Indeterminate equations) का हल।
- ग्रहगणित: ग्रहों की गतियों, कक्षाओं और देशांतरों का गणितीय अध्ययन।
- गोलाध्याय: खगोलीय गोले और गोलाकार त्रिकोणमिति (Spherical trigonometry) का अध्ययन।
- अन्य ग्रंथ: गणित कौमुदी (नारायण पंडित द्वारा रचित) और रोमक सिद्धांत (वराहमिहिर द्वारा संकलित प्राचीन खगोलीय ग्रंथ)।
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