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भारत के नृत्य रूप

शास्त्रीय नृत्य रूप (SNA द्वारा मान्यता प्राप्त 8)

तमिलनाडु के शास्त्रीय नृत्य 'भरतनाट्यम' की उत्पत्ति किन प्राचीन मंदिरों से हुई है और इसके ऐतिहासिक नाम क्या हैं? (भरतनाट्यम उत्पत्ति व नाम)
  • उत्पत्ति: तमिलनाडु के तंजौर जिले के हिंदू मंदिरों से हुई। इसका मूल स्रोत भरत मुनि द्वारा रचित 'नात्यशास्त्र' है।
  • ऐतिहासिक नाम:
    • सादिर (Sadir) या सादिर अट्टम: यह मंदिर की देवदासियों द्वारा राजाओं के दरबार में एकल रूप से प्रस्तुत किया जाने वाला नृत्य था।
    • दासी अट्टम (Dasi Attam): देवदासियों द्वारा किए जाने के कारण इसे दासी अट्टम भी कहा जाता था।
    • तंजौर नाट्यम: तंजावुर राजदरबार के संरक्षण के कारण।
भरतनाट्यम को 'अग्नि नृत्य' क्यों कहा जाता है, और इसके प्रदर्शन का अनुक्रम (मार्गम) क्या है? (भरतनाट्यम मार्गम)
  • अग्नि नृत्य (Fire Dance): इस नृत्य में मानव शरीर की गतियां जलती हुई लौ (flame) की भौतिकी से मेल खाती हैं, इसलिए इसे 'अग्नि नृत्य' भी कहा जाता है।
  • मार्गम (Margam - प्रस्तुति अनुक्रम):
    1. अलारिप्पु (Alarippu): बुद्ध या ईश्वर की स्तुति के साथ नृत्य की शुरुआत (आशीर्वाद मांगना)।
    2. जतिस्वरम (Jatiswaram): बिना किसी गीत के केवल शुद्ध तकनीकी ताल (नृत्त)।
    3. शब्दम (Shabdam): प्रथम बार अभिनय (भावों) की शुरुआत, अक्सर राजा या देवता की प्रशंसा में।
    4. वर्णम (Varnam): सबसे महत्वपूर्ण और कठिन भाग, जिसमें नृत्त (शुद्ध नृत्य) और अभिनय का सामंजस्य होता है।
    5. पदम (Padam): देवी-देवताओं (जैसे कृष्ण) के प्रति दिव्य प्रेम और समर्पण का धीमा अभिव्यंजक नृत्य।
    6. तिल्लाना (Tillana): अंतिम तेज गति वाला शुद्ध नृत्य (नृत्त) जो असाधारण फुटवर्क और मूर्तिकला मुद्राओं के साथ समाप्त होता है।
  • मुद्रा: इसमें 'कटक मुख हस्त' (अंगूठे, तर्जनी और मध्यमा को जोड़कर 'ॐ' का प्रतीक बनाना) प्रमुख हस्त मुद्रा है।
भरतनाट्यम को आधुनिक काल में किसने पुनर्जीवित किया था, और 'तंजावुर चतुष्टय' (Tanjore Quartet) का क्या महत्व है? (भरतनाट्यम प्रवर्तक)
  • पुनरुद्धारक: रुक्मिणी देवी अरुंडेल और ई. कृष्ण अय्यर। उन्होंने देवदासी प्रथा से जुड़े सामाजिक कलंक को हटाकर इसे कला मंच पर पुनर्जीवित किया। रुक्मिणी देवी ने चेन्नई में 'कलाक्षेत्र' संस्थान की स्थापना की।
  • तंजावुर चतुष्टय (Tanjore Quartet): 19वीं सदी के चार भाई - चिनय्या, पोन्नय्या, वडिवेलु और शिवानंदम
    • महत्व: ये तंजावुर दरबार के संगीतकार और शिक्षक थे जिन्होंने भरतनाट्यम के आधुनिक मार्गम (अनुक्रम) को संहिताबद्ध (Codify) किया और इसके वर्तमान स्वरूप को आकार दिया।
  • मंदिर मूर्तियां: चिदंबरम के नटराज मंदिर के गोपुरम पर भरतनाट्यम की 108 शास्त्रीय मुद्राओं (करण) की मूर्तियां खुदी हैं।
उत्तर भारत के शास्त्रीय नृत्य 'कथक' के विकास की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और इसके प्रमुख घरानों (लखनऊ, जयपुर, बनारस) की क्या विशेषताएं हैं? (कथक घराने)
  • ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: प्राचीन काल में मंदिरों में पौराणिक कहानियों (कथा) को गाकर सुनाने वाले 'कथाकारों' से विकसित हुआ। बाद में मुगलों और अवध के नवाबों (जैसे वाजिद अली शाह) के संरक्षण में इस पर फारसी व दरबारी संस्कृति का गहरा प्रभाव पड़ा।
  • लखनऊ घराना: नवाब वाजिद अली शाह के काल में विकसित। इसकी विशेषता भाव, अभिनय, लास्य (सौम्यता) और नाजुक अंग-संचालन पर अत्यधिक बल देना है। प्रसिद्ध प्रतिपादक: पंडित बिरजू महाराज, लच्छू महाराज।
  • जयपुर घराना: राजस्थान के राजपूत राजाओं के संरक्षण में विकसित। इसकी विशेषता वीर रस, तीव्र पदचाप (फुटवर्क), जटिल चक्कर और कठिन ताल प्रणालियाँ हैं।
  • बनारस घराना: इसकी विशेषता आध्यात्मिक भक्ति (शिव-पार्वती की स्तुति), फर्श पर घुटने टेक कर किए जाने वाले अभिनय और संतुलित चक्कर हैं।
कथक में प्रयुक्त होने वाली तकनीकी शब्दावलियों - तत्कार, जुगलबंदी, गत भाव और क्रमलय का क्या अर्थ है? (कथक तकनीकी शब्द)
  • तत्कार (Tatkar): कथक का मूल पदचाप (फुटवर्क)। नर्तक पैरों के तलवों को फर्श पर थपथपाकर घुंघरुओं की आवाज से जटिल ताल उत्पन्न करता है।
  • जुगलबंदी (Jugalbandi): कथक का मुख्य आकर्षण, जिसमें नर्तक और तबला या पखावज वादक के बीच एक दोस्ताना प्रतिस्पर्धी जुगलबंदी होती है। वादक जो बोल बजाता है, नर्तक पैरों से उसकी हूबहू नकल करता है।
  • गत भाव (Gat Bhava): बिना किसी पार्श्व संगीत या गायन के केवल चेहरे के हाव-भाव और शारीरिक मुद्राओं द्वारा पौराणिक कहानियों (जैसे माखन चोरी, कालिया दमन) को अभिनीत करना।
  • क्रमलय (Kramalaya): प्रदर्शन का समापन भाग, जिसमें पदचाप की गति विलंबित (धीमी) से शुरू होकर अति-द्रुत (अत्यंत तेज) लय तक पहुँचती है।
केरल के प्रसिद्ध शास्त्रीय नृत्य-नाटक 'कथकली' की उत्पत्ति किन पूर्ववर्ती शैलियों (जैसे कूटियाट्टम व कृष्णाट्टम) से हुई है और इसकी साहित्यिक भाषा क्या है? (कथकली उत्पत्ति व भाषा)
  • पूर्ववर्ती जड़ें:
    • कूटियाट्टम (Koodiyattam): केरल का प्राचीन संस्कृत रंगमंच (यूनेस्को अमूर्त धरोहर)।
    • कृष्णाट्टम (Krishnattam): आठ नाटकों की श्रृंखला जो कृष्ण के जीवन को दर्शाती थी।
    • रामानाट्टम: राम के जीवन पर आधारित नृत्य-नाटक।
  • मणिप्रवालम (Manipravalam): कथकली नाटकों के गीतों (साहित्य) की भाषा 'मणिप्रवालम' होती है, जो मलयालम (स्थानीय भाषा) और संस्कृत का एक सुंदर मिश्रण है।
  • विशेषता: यह रात भर चलने वाला प्रदर्शन है जो पारंपरिक रूप से पुरुष कलाकारों द्वारा किया जाता है (अब महिलाएं भी भाग लेती हैं)। मुख्य वाद्य यंत्र चेंडा (विशाल ड्रम) है।
कथकली में प्रयुक्त होने वाले रंग-श्रृंगार (जैसे हरा, लाल, काला, पीला) किन पात्रों (सात्विक, राजसिक, तामसिक) का प्रतिनिधित्व करते हैं? (कथकली मेकअप व पात्र)
  • मेकअप (चुट्टी - Chutti): चेहरे पर चावल के आटे और चूने के मिश्रण से एक सफेद किनारा (दाढ़ी) बनाया जाता है। पात्रों के स्वभाव के अनुसार चेहरे का रंग तय होता है:
    • हरा (पच्चा - Paccha): सात्विक (उदार, वीर और दैवीय पात्र - जैसे राम, कृष्ण, अर्जुन)।
    • लाल धारी के साथ हरा (कथी - Katti): राजसिक (अहंकारी लेकिन वीर पात्र - जैसे रावण, दुर्योधन)।
    • लाल दाढ़ी (ताड़ी - Thadi): तामसिक (दुष्ट और क्रूर पात्र - जैसे दुःशासन)।
    • काला (करी - Kari): अत्यंत दुष्ट, राक्षस या शिकारी (जैसे शूर्पणखा)।
    • पीला/नारंगी (मिनुक्कू - Minukku): शांत, आध्यात्मिक पात्र - जैसे महिलाएं, ऋषि-मुनि और साधु।
  • नेत्र गतियां: कथकली में लाल आँखों (चूने के बीज डालकर लाल की जाती हैं) और भौंहों की गतियाँ सभी शास्त्रीय नृत्यों में सबसे जटिल और व्यापक होती हैं।
आंध्र प्रदेश के शास्त्रीय नृत्य 'कुचिपुड़ी' की प्रदर्शन संरचना में 'दारू' (Daru) और 'कौतुवम' (Kautuvam) का क्या अर्थ है? (कुचिपुड़ी प्रदर्शन संरचना)
  • उत्पत्ति: आंध्र प्रदेश के कृष्णा जिले के 'कुचिपुड़ी' (कुचेलपुरम) गाँव से हुई। यह मूल रूप से पुरुषों (विशेषकर ब्राह्मणों) का नृत्य-नाटक था।
  • दारू (Daru): कुचिपुड़ी प्रदर्शन का एक अनूठा तत्व। जब कोई मुख्य पात्र (जैसे सत्यभामा) पहली बार मंच पर प्रवेश करता है, तो वह एक छोटे नृत्य-गीत (प्रवेश दारू) के माध्यम से अपनी पहचान और स्थिति का परिचय देता है।
  • कौतुवम (Kautuvam): एक नृत्य खंड जिसमें नर्तक जटिल शारीरिक कलाबाजी और पदचाप का प्रदर्शन करता है, जो देवताओं की प्रशंसा से जुड़ा होता है।
  • पातक्षर / सोल्लकट्टू: शुद्ध नृत्त का तालबद्ध अंश।
कुचिपुड़ी के अंतर्गत किए जाने वाले विशेष प्रदर्शनों - 'तरंगम' (थाली पर नृत्य), 'मंडूक शब्दम' और 'जल चित्र नृत्यम' की क्या विशेषताएं हैं? (कुचिपुड़ी विशेष प्रदर्शन)
  • तरंगम (Tarangam): कुचिपुड़ी का सबसे प्रसिद्ध आकर्षण। इसमें नर्तक पीतल की थाली के किनारों पर पैर रखकर संतुलन बनाता है और साथ ही सिर पर पानी से भरा मिट्टी या पीतल का घड़ा रखकर अत्यंत जटिल पदचाप करता है। यह कृष्ण की रासलीला से प्रेरित है।
  • मंडूक शब्दम (Manduka Shabdam): इसमें मेंढक की कहानी को नृत्य और अभिनय के माध्यम से दर्शाया जाता है, जिसमें मेंढक अंततः एक सुंदर राजकुमारी में बदल जाता है।
  • जल चित्र नृत्यम (Jala Chitra Nrityam): इसमें नर्तक नृत्य करते हुए अपने पैरों के अँगूठे से फर्श पर बिछी रंगीन रेत या गीली मिट्टी पर शेर या मोर जैसी आकृतियों का सुंदर रेखाचित्र बनाता है।
  • प्रमुख कलाकार: वेम्पति चिन्ना सत्यम, राजा और राधा रेड्डी, यामिनी कृष्णमूर्ति।
ओडिशा के शास्त्रीय नृत्य 'ओडिसी' के प्राचीनतम रूपों (महारी) और इसके शरीर के तीन झुकावों वाली प्रसिद्ध 'त्रिभंगी' (Tribhanga) मुद्रा का क्या विवरण है? (ओडिसी त्रिभंगी व इतिहास)
  • प्राचीनतम रूप (महारी - Mahari): ओडिसी की उत्पत्ति ओडिशा के जगन्नाथ मंदिर में भगवान की सेवा करने वाली 'महारी' (ओडिशी देवदासियों) से हुई। इसके अलावा महल के लड़कों द्वारा किए जाने वाले 'गोटीपुआ' (Gotipua) नृत्य ने भी इसे प्रभावित किया।
  • त्रिभंगी (Tribhanga) मुद्रा: ओडिसी की सबसे विशिष्ट पहचान। इसमें शरीर को तीन स्थानों पर मोड़ा जाता है - सिर, छाती और कूल्हे (S-shape)। यह मुद्रा नारी सुलभ कोमलता और अत्यधिक संतुलन को दर्शाती है।
  • चौक (Chauk): एक अन्य मुद्रा जिसमें शरीर का भार दोनों पैरों को चौड़ा करके बराबर बांटा जाता है (चौकोर स्थिति)।
  • साहित्यिक आधार: जयदेव द्वारा रचित 'गीत गोविंद' के प्रेम प्रसंग ओडिसी नृत्य के मुख्य अभिनय का आधार हैं।
ओडिसी नृत्य के अंत में प्रदर्शित किए जाने वाले मदों - 'त्रिखंड मजुर' और 'मोक्ष' का क्या आध्यात्मिक अर्थ है? (ओडिसी समापन मद्द)
  • त्रिखंड मजुर (Trikhanda Majura): प्रदर्शन का वह चरण जिसमें कलाकार तीन भागों में प्रणाम करता है - पहला देवताओं को (स्वर्ग), दूसरा गुरुओं को (मंच), और तीसरा दर्शकों को (पृथ्वी)। इसके बाद वह मंच से विदा लेता है।
  • मोक्ष (Moksha): ओडिसी प्रदर्शन का अंतिम चरम बिंदु। इसमें तेज गति की तालबद्ध गतियों द्वारा आत्मा की परमात्मा में लीन होने की खुशी (मुक्ति/मोक्ष) को दर्शाया जाता है।
  • मूर्तियाँ: उदयगिरि-खंडगिरि की रानीगुम्फा गुफा में और कोणार्क सूर्य मंदिर की दीवारों पर ओडिसी नर्तकियों की मूर्तियाँ प्रचुरता में खुदी हैं।
  • पुनरुद्धारक: केलुचरण महापात्र (जिन्होंने इसे आधुनिक मंच पर स्थापित किया) और सोनल मानसिंह।
मणिपुर के शास्त्रीय नृत्य की उन विशेषताओं का उल्लेख करें जो इसे अन्य शास्त्रीय नृत्यों से अलग बनाती हैं (जैसे घुंघरू का न होना) और इसके प्रमुख प्रकार क्या हैं? (मणिपुरी नृत्य विशेषताएं)
  • कोई घुंघरू नहीं (No Anklets): भारत के सभी शास्त्रीय नृत्यों में केवल मणिपुरी ही ऐसा नृत्य है जिसमें नर्तक पैरों में घुंघरू (pajeb) नहीं पहनते। पैर बहुत कोमलता से फर्श को छूते हैं जिससे कोई तीव्र ध्वनि उत्पन्न नहीं होती।
  • लास्य की प्रधानता: यह अत्यधिक शालीन, कोमल और वृत्ताकार (circular) गतियों वाला नृत्य है, जिसमें कोई अचानक झटका या कोणीय स्थिति (जैसे त्रिभंग) नहीं होती।
  • प्रकार:
    • रासलीला: कृष्ण, राधा और गोपियों के पवित्र प्रेम पर आधारित।
    • संकीर्तन: पुरुषों द्वारा ढोल (पुंग) और झांझ बजाते हुए सामूहिक कीर्तन नृत्य।
    • थांग-ता (Thang-Ta): मणिपुर की तलवार और भाले वाली पारंपरिक युद्ध कला जो नृत्य का रूप ले चुकी है।
  • लाई हरोबा (Lai Haraoba): मणिपुर का प्राचीन अनुष्ठानिक त्योहार, जिसे मणिपुरी नृत्य का जनक माना जाता है।
मणिपुरी नृत्य के रासलीला प्रदर्शन में महिलाओं द्वारा पहनी जाने वाली विशेष बेलनाकार स्कर्ट (कुमिल) और पुरुषों की वेशभूषा का क्या विवरण है? (मणिपुरी वेशभूषा)
  • कुमिल / पोल्लोई (Kumil/Polloi): महिला नर्तकियों द्वारा पहनी जाने वाली एक विशेष बेलनाकार (बैरल के आकार की) सख्त स्कर्ट। यह बाँस के ढांचे से बनी होती है और ऊपर मखमली कपड़े पर चमकीले तारों व दर्पणों का काम होता है। नृत्य करते समय स्कर्ट पैरों को पूरी तरह ढके रखती है।
  • फानेक (Phanek): मणिपुर की महिलाओं द्वारा पहनी जाने वाली एक अन्य पारंपरिक लपेटी जाने वाली स्कर्ट।
  • पारदर्शी घूंघट: महिला नर्तकियां चेहरे पर एक महीन सफेद पारदर्शी घूंघट पहनती हैं।
  • पुरुष (पुंग चोलोम): सफेद धोती, कुर्ता और सिर पर गोल सफेद पगड़ी पहनकर पुंग (ढोल) बजाते हुए कलाबाजी करते हैं।
असम के 15वीं शताब्दी के शास्त्रीय नृत्य 'सत्रीया' के प्रवर्तक कौन थे और इसे संगीत नाटक अकादमी द्वारा शास्त्रीय नृत्य का दर्जा कब दिया गया? (सत्रीया नृत्य history)
  • संस्थापक: 15वीं शताब्दी में महान वैष्णव संत और समाज सुधारक श्रीमंत शंकरदेव ने असम के 'सत्रों' (वैष्णव मठों) में इस नृत्य शैली की शुरुआत की थी।
  • उद्देश्य: वैष्णव धर्म और कृष्ण भक्ति का लोक कला के माध्यम से प्रचार करना।
  • शास्त्रीय दर्जा: संगीत नाटक अकादमी (SNA) ने 15 नवंबर 2000 को इसे भारत के 8वें शास्त्रीय नृत्य के रूप में आधिकारिक मान्यता दी।
  • पारंपरिक सीमा: मूल रूप से यह केवल पुरुषों ('भोकोट्स' या पुरुष भिक्षुओं) द्वारा सत्रों में किया जाता था, लेकिन अब महिलाएं भी इसका मंचन करती हैं।
सत्रीया नृत्य के प्रदर्शन अंगों - 'अंकिया नाट' (एकांकी नाटक) और 'बरगीत' (भक्ति गीत) का क्या महत्व है? (सत्रीया प्रदर्शन अंग)
  • अंकिया नाट (Ankia Naat): शंकरदेव द्वारा रचित पारंपरिक असमिया एकांकी नाटक। सत्रीया नृत्य मुख्य रूप से इन नाटकों के बीच नृत्य-नाटिका के रूप में किया जाता है।
  • बरगीत (Borgeet): शंकरदेव और माधवदेव द्वारा रचित शास्त्रीय रागों पर आधारित विशिष्ट भक्ति गीत जो सत्रीया प्रदर्शन के दौरान गाए जाते हैं।
  • विशेषताएं: सत्रीया के दो भाग होते हैं - 'अप्सरा नृत्य' (लास्य प्रधान) और 'ओजापाली' (कथावाचक शैली)। मुख्य वाद्य यंत्र खोल (मिट्टी का ढोल) और ताल (झांझ) हैं।
केरल की एकल महिला शास्त्रीय नृत्य शैली 'मोहिनीअट्टम' के लास्य प्रधान स्वरूप, सोपान संगीत और इसके पुनरुद्धारक वल्लथोल नारायण मेनन का क्या विवरण है? (मोहिनीअट्टम लास्य व संगीत)
  • नाम का अर्थ: 'मोहिनी' (भगवान विष्णु का सुंदर रूप) + 'अट्टम' (नृत्य) - अर्थात मोहिनी का नृत्य। यह भस्मासुर वध और समुद्र मंथन की कथाओं पर आधारित है।
  • लास्य की प्रधानता: यह पूरी तरह से कोमल, लहराती हुई गतियों और आंखों के आकर्षक संकेतों (लास्य) पर आधारित है। इसमें तांडव (उग्र) का कोई अंश नहीं होता।
  • वेशभूषा: नर्तकी सुनहरे बॉर्डर वाली सादी सफेद या मलाईदार सफेद (Kasavu) रेशमी साड़ी पहनती है और बालों को बाईं ओर एक तरफ बांधकर चमेली के फूलों के गजरे से सजाती है।
  • सोपान संगीत (Sopanam): यह केरल के मंदिरों में गाया जाने वाला पारंपरिक संगीत है, जिस पर मोहिनीअट्टम किया जाता है।
  • पुनरुद्धारक: प्रसिद्ध कवि वल्लथोल नारायण मेनन (जिन्होंने केरल कलामंडलम की स्थापना की) और त्रावणकोर के महाराजा स्वाति तिरुनल।
संगीत नाटक अकादमी द्वारा मान्यता प्राप्त आठ शास्त्रीय नृत्यों के मूल राज्यों और उनकी मुख्य विशेषताओं का तुलनात्मक विवरण क्या है? (शास्त्रीय नृत्यों की तुलना)
नृत्यराज्यमुख्य शैली/मुद्रावेशभूषा / वाद्य
भरतनाट्यमतमिलनाडुअरमंडी (अर्ध-बैठक), मार्गम क्रमरेशमी साड़ी, कटक मुख हस्त
कथकउत्तर भारततत्कार (फुटवर्क), तीव्र चक्करअनारकली सूट/धोती, घुंघरू
कथकलीकेरलमुखाभिनय, नेत्र गतियां, चुट्टी मेकअपभारी मुकुट, चेंडा ढोल
कुचिपुड़ीआंध्र प्रदेशतरंगम (थाली नृत्य), दारू प्रवेशपीतल की थाली, मटका
ओडिसीओडिशात्रिभंगी (3 शरीर मोड़), चौक मुद्रासंबलपुरी साड़ी, गीत गोविंद
मणिपुरीमणिपुरलास्य, कोमल वृत्ताकार गतियांकुमिल (बैरल स्कर्ट), पुंग (कोई घुंघरू नहीं)
सत्रीयाअसमसत्रों में भक्ति, खोल-ताल संगतखोल ड्रम, असमिया सिल्क
मोहिनीअट्टमकेरललास्य (एकल महिला), सोपान संगीतसफेद-सुनहरी साड़ी, चमेली गजरा

लोक और आदिवासी नृत्य

हिमाचल प्रदेश के प्रसिद्ध लोक नृत्य 'नाटी' (Nati) के विभिन्न प्रकारों और इसके गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में दर्ज होने का क्या विवरण है? (नाटी लोक नृत्य)
  • क्षेत्र: हिमाचल प्रदेश के कुल्लू, शिमला, सिरमौर और चंबा जिलों का प्रमुख लोक नृत्य।
  • गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड: वर्ष 2015 के कुल्लू दशहरा उत्सव के दौरान 9,892 महिलाओं ने पारंपरिक परिधानों में एक साथ नाटी नृत्य प्रस्तुत किया, जो दुनिया का सबसे बड़ा लोक नृत्य प्रदर्शन बना।
  • विशेषताएं: यह शांत और धीमी गति का नृत्य है जिसमें लोग एक-दूसरे का हाथ पकड़कर अर्धवृत्ताकार या गोलाकार श्रृंखला बनाते हैं। मुख्य वाद्य यंत्र ढोल, नगाड़ा और शहनाई हैं।
  • प्रकार: महासुवी नाटी, सिरमौरी नाटी, किन्नौरी नाटी।
केरल और कर्नाटक के मालाबार क्षेत्र में की जाने वाली प्रसिद्ध अनुष्ठानिक कला 'तेय्यम' (Theyyam) के सामाजिक संदर्भों और इसकी मुख्य विशेषताओं का वर्णन करें। (तेय्यम अनुष्ठान)
  • क्षेत्र: उत्तरी केरल (मालाबार) और कर्नाटक के सीमावर्ती क्षेत्र।
  • सामाजिक संदर्भ: यह एक अत्यंत लोकप्रिय अनुष्ठानिक पूजा नृत्य है जो पारंपरिक रूप से अनुसूचित जाति (SC) और पिछड़े वर्ग (जैसे वन्नान, मलयान, वेल्लन) के कलाकारों द्वारा किया जाता है।
  • दैवीय रूपांतरण: प्रदर्शन के दौरान कलाकारों को साक्षात देवता का अवतार माना जाता है। ग्रामीण अपनी समस्याओं के समाधान के लिए उनके सामने मन्नत मांगते हैं।
  • विशेषताएं: विशालकाय लाल शिरोभूषण (शिरोवस्त्र), चेहरे पर अद्भुत जटिल लाल-पीला मेकअप और भारी परिधान। यह खुले आँगनों में (मंदिर के पवित्र काव्यों/कावु के सामने) होता है, यहाँ कोई मंच या पर्दा नहीं होता।
  • ब्राह्मणेतर अनुष्ठान: इसमें पारंपरिक मंदिरों से भिन्न देवताओं को शराब और मुर्गों की रक्त बलि चढ़ाने की प्रथा शामिल है।
ओडिशा के गंजाम जिले में चैत्र माह में शिव और शक्ति की भक्ति में किए जाने वाले पारंपरिक 'दंड नाट' (Danda Nata) के दंडुआ भक्तों और प्रभाकर नर्तकों की क्या भूमिका है? (दंड नाट)
  • स्थान: ओडिशा का गंजाम जिला। यह कलिंग साम्राज्य के काल से चली आ रही एक प्राचीन लोक कला है।
  • धार्मिक संदर्भ: केवल पुरुष भाग लेते हैं जो चैत्र मास में भीषण गर्मी में 13 से 21 दिनों तक शिव और शक्ति की आराधना में कठोर व्रत रखते हैं।
  • दंडुआ (Dandua): भाग लेने वाले इन भक्तों को 'दंडुआ' कहा जाता है। वे जल, अग्नि और धूल पर लेटकर कठिन शारीरिक तपस्या करते हैं।
  • प्रभाकर (Prabhakar): दंड नाट के मुख्य नर्तक जो अपने कंधों पर लकड़ी का ढांचा (मयूर की आकृति का) बांधकर तीव्र ढोल और माहुरी (शहनाई जैसा वाद्य) की संगत पर नृत्य करते हैं।
त्रिपुरा की मोग बौद्ध (Mogh Buddhists) जनजाति द्वारा अपने नववर्ष के अवसर पर किया जाने वाला 'संगराई' (Sangrai) नृत्य क्यों महत्वपूर्ण है? (संगराई नृत्य)
  • जनजाति: त्रिपुरा की मोग (Mogh) जनजाति द्वारा किया जाता है जो बौद्ध धर्म के अनुयायी हैं।
  • अवसर: यह प्रत्येक वर्ष अप्रैल के मध्य में चैत्र संक्रांति (मोग नववर्ष - संगराई त्योहार) के उत्सव के दौरान किया जाता है।
  • विशेषता: युवा लड़के और लड़कियां रंग-बिरंगे पारंपरिक कपड़ों में ढोल और बांसुरी की थाप पर नृत्य करते हैं और पवित्र जल का छिड़काव करते हैं, जो आत्मा की शुद्धि का प्रतीक है।
तमिलनाडु के पारंपरिक लोक नृत्य 'करकट्टम' (Karakattam) के देवी मारियम्मन से संबंध और सिर पर घड़ा संतुलित करने की कला का विवरण दें? (करकट्टम)
  • स्थान: तमिलनाडु का प्राचीन और लोकप्रिय लोक नृत्य।
  • देवी मारियम्मन: यह वर्षा और महामारियों से रक्षा करने वाली स्थानीय देवी मारियम्मन की पूजा में किया जाता है।
  • संतुलन कला: नर्तक (पुरुष या महिला) अपने सिर पर पीतल या मिट्टी के घड़े (जिसमें कच्चा चावल, कपूर और फूल भरे होते हैं) को बिना हाथ लगाए केवल सिर की त्वचा और गर्दन के संतुलन से रोककर तीव्र ढोल (नादस्वरम) की थाप पर अद्भुत कलाबाजी करते हैं।
अरुणाचल प्रदेश के मोनपा व गांगटे, असम के सतोइया नित्य और उत्तराखंड के हुड़का छुड़का (Hurka Chhurka) लोक नृत्यों का क्या विवरण है? (अन्य राज्यों के लोक नृत्य)
  • मोनपा नृत्य: अरुणाचल प्रदेश की मोनपा जनजाति द्वारा बौद्ध त्योहार 'लोसर' (Losar - नववर्ष) के दौरान शेर और याक का मुखौटा पहनकर किया जाने वाला पारंपरिक नृत्य।
  • गांगटे: अरुणाचल प्रदेश का एक अन्य मार्शल-लोक नृत्य।
  • सतोइया नित्य: असम का पारंपरिक सामूहिक लोक नृत्य।
  • हुड़का छुड़का: उत्तराखंड के गढ़वाल व कुमाऊं क्षेत्र में पहाड़ी ढलानों पर धान और मक्के की रोपाई (कृषि कार्य) के समय ऊर्जा बढ़ाने के लिए हुड़का (डमरू जैसा वाद्य) बजाकर गाया और किया जाने वाला लोक नृत्य।
भारत के विभिन्न राज्यों के सर्वाधिक महत्वपूर्ण लोक नृत्यों (जैसे घूमर, गरबा, यक्षगान, लावणी, राउफ, पंडवानी, बिहू) का राज्यवार विवरण क्या है? (राज्यवार लोक नृत्य सूची)
  • यक्षगान (कर्नाटक): नृत्य, संगीत और नाटक का एक अनूठा संगम जिसमें पौराणिक आख्यान (महाभारत, रामायण) दर्शाए जाते हैं।
  • कालबेलिया (राजस्थान): सपेरा जनजाति की महिलाओं द्वारा किया जाने वाला नागिन जैसी गतियों वाला नृत्य (यूनेस्को अमूर्त सूची)।
  • घूमर (राजस्थान): भील जनजाति से उत्पन्न, जिसमें महिलाएं लंबे लहंगे का गोल घेरा (घूम) बनाते हुए घूमती हैं।
  • गरबा (गुजरात): नवरात्रि के दौरान मिट्टी के छिद्रित दीये (गर्भदीप) के चारों ओर किया जाने वाला नृत्य।
  • लावणी (महाराष्ट्र): ढोलकी की तीव्र थाप पर किया जाने वाला अत्यधिक ऊर्जावान लास्य नृत्य।
  • राउफ (जम्मू-कश्मीर): ईद और फसल कटाई के समय कश्मीरी महिलाओं द्वारा आमने-सामने खड़ी होकर किया जाने वाला नृत्य।
  • बिहू (असम): फसलों की बुवाई और कटाई के समय असमिया युवाओं द्वारा किया जाने वाला तीव्र गति का सामूहिक नृत्य।
  • पंडवानी (छत्तीसगढ़): तीजन बाई द्वारा प्रसिद्ध किया गया महाकाव्य (महाभारत) गायन-नृत्य रूप।
  • बांस नृत्य / चेरॉ (मिजोरम): बांस की बल्लियों को जमीन पर थपथपाकर उनके बीच नर्तकों द्वारा किया जाने वाला संतुलन नृत्य।
ओडिशा के पुरी में आयोजित होने वाली जगन्नाथ रथ यात्रा के दौरान रथों के विशाल आकार, उनके प्रतिवर्ष नए निर्माण की परंपरा और स्थापत्य इंजीनियरिंग का क्या विवरण है? (जगन्नाथ रथ यात्रा रथ इंजीनियरिंग)
  • रथों का वजन: तीनों मुख्य रथों (नंदीघोष, तालध्वज, देवदलन) का वजन 200 टन से अधिक होता है।
  • प्रतिवर्ष नया निर्माण: पूरी दुनिया में यह एकमात्र ऐसा उत्सव है जहाँ इतने विशाल लकड़ी के रथों का उपयोग करने के बाद उन्हें तोड़ दिया जाता है और हर साल पूरी तरह से नए सिर से (ताजा जंगलों से लाई गई लकड़ी से) बनाया जाता है।
  • कारीगरी: इसमें किसी धातु की कील या स्क्रू का उपयोग नहीं होता; पूरे पहियों और धुरी को केवल लकड़ी के इंटरलॉकिंग जोड़ों और रस्सियों से बांधा जाता है, जो प्राचीन भारतीय वास्तुकला इंजीनियरिंग का एक बेजोड़ उदाहरण है।

UPSC PYQ विश्लेषण 2015-2023 पर आधारित