भारतीय संगीत - मुख्य परीक्षा
संगीत भारतीय संस्कृति के केंद्र में है जिसकी गहरी ऐतिहासिक जड़ें हैं। पौराणिक कथाएं नारद मुनि को संगीत प्रस्तुत करने का श्रेय देती हैं। सिंधु घाटी सभ्यता से सात-छेद वाली बांसुरी इसकी प्राचीन उत्पत्ति को दर्शाती है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
प्राचीन काल (वैदिक से 10वीं शताब्दी)
- प्रारंभिक संगीत वेदों से जुड़ा; साम वेद आधार के रूप में
- वैदिक पाठ: एक स्वर : कई स्वर : 7 मूल स्वर (सप्तस्वर)
- नारद परिव्राजकोपनिषद : सप्तस्वरों का पहला उल्लेख
- संगीत अनुष्ठानों, यज्ञों, यागों से जुड़ा
- कुतप : वाद्य संगीत का प्रारंभिक रूप
संगीत शब्द:
- सात स्वर, तीन ग्राम, इक्कीस मूर्छनाएं, तीन लय
प्रमुख ग्रंथ:
- भरत का नाट्य शास्त्र (2री ई.) : पहला विस्तृत ग्रंथ; वाद्यों का वर्गीकरण; 22 माइक्रोटोन (श्रुतियां) प्रस्तुत
- मतंग का बृहद्धर्म : राग और श्रुति सिद्धांत विकसित किए
मध्यकालीन काल (13वीं-17वीं शताब्दी)
- हिंदुस्तानी और कर्नाटक संगीत में विभाजन
- मुस्लिम शासन के तहत अरबी और फारसी संगीत के साथ सांस्कृतिक आदान-प्रदान
- भक्ति आंदोलन (7वीं शताब्दी से) : संतों द्वारा भक्ति गीत
प्रमुख व्यक्तित्व:
- पुरंदर दास (15वीं ई.) : 'कर्नाटक संगीत पितामह'; तालों को सरलीकृत किया
- विद्यारण्य (14वीं ई.) : रागों को 15 मेलों में वर्गीकृत किया
- राममात्य (16वीं ई.) : स्वर मेला कलानिधि में 20 मेले
- वेंकटमखी (17वीं ई.) : चतुर्दण्डी प्रकाशिका; 72 मेले
आधुनिक काल (18वीं शताब्दी - वर्तमान)
- कर्नाटक संगीत का स्वर्ण युग : त्रयी: श्याम शास्त्री, त्यागराज, मुत्तुस्वामी दीक्षितर
- कृति, स्वरजाति, वर्ण, रागमालिका का विस्तार
- वायलिन दक्षिण भारतीय शास्त्रीय संगीत का अभिन्न अंग बना
- पश्चिमी वाद्य (मैंडोलिन, सैक्सोफोन) शामिल किए गए
- संरक्षण के लिए संगीत अंकन प्रणालियां (19वीं शताब्दी)
- भावी पीढ़ी के लिए ऑडियो/वीडियो रिकॉर्डिंग (20वीं शताब्दी)
हिंदुस्तानी संगीत (उत्तर भारत)
मुख्य तत्व
- भरत के नाट्यशास्त्र से उत्पन्न; 14वीं शताब्दी में विभाजित
- संगीत संरचना और आशुरचना पर जोर
- शुद्ध स्वर सप्तक (प्राकृतिक स्वरों का अष्टक) अपनाता है
- हिंदू परंपरा, वैदिक दर्शन और फारसी प्रभावों का संयोजन
सात स्वर:
| स्वर | विशेषता |
|---|---|
| सा | स्थिरता प्रदान करने वाला टॉनिक |
| रे | ऊर्जावान और उत्साहित |
| ग | शांत और सुंदर |
| म | मधुर और कोमल |
| प | ठोस और मजबूत |
| ध | उदास और आत्मनिरीक्षण |
| नि | रहस्यमय और मोहक |
मूल अवधारणाएं
राग (स्वर विषय):
- विशिष्ट स्वरों और वाक्यांशों को परिभाषित करने वाली स्वर संरचनाएं
- प्रत्येक विशिष्ट भावनाएं/मनोदशाएं जगाता है
- उदाहरण: रागेश्री (प्रेम), यमन कल्याण (भव्यता), मालकौंस (उदासी)
ताल (लय):
- जटिल चक्रों के साथ लयात्मक ढांचा
- तीनताल (16 मात्रा), एकताल (12 मात्रा), झूमरा (14 मात्रा), दादरा (6 मात्रा), रूपक (7 मात्रा)
अलंकार (सजावट):
- मींड (ग्लाइड), मुर्की (ट्रिल), गमक (कंपन), खींच (स्वर झुकाव), स्थायी (धारित स्वर)
आशुरचना:
- राग और ताल ढांचे के भीतर स्वतःस्फूर्त सृजन
- व्यक्तिगत कलात्मकता को दर्शाता है
प्रसारण:
- गुरु-शिष्य परंपरा
प्रमुख वाद्य:
- तबला, सारंगी, सितार, संतूर, बांसुरी, वायलिन
गायन रूप
1. ध्रुपद:
- सबसे पुराना और भव्य रूप
- नाट्यशास्त्र (200 ई.पू.-200 ई.) में उल्लेख
- सम्राट अकबर के शासनकाल में चरम
- उस्ताद: स्वामी हरिदास, तानसेन (अकबर के नवरत्न)
- आलाप (सबसे लंबा भाग) से प्रारंभ
- घराने: डागरी, दरभंगा, बेतिया, तलवंडी
2. ख्याल:
- फारसी "विचार/कल्पना" से व्युत्पन्न
- अमीर खुसरो द्वारा प्रवर्तित
- विशिष्ट राग और ताल में छोटे गीत (बंदिश)
- विषय: राजाओं की प्रशंसा, ऋतुएं, कृष्ण की लीलाएं, दिव्य प्रेम
- घराने: ग्वालियर, किराना, पटियाला, आगरा, भेंडीबाजार
3. तराना:
- लयात्मक पैटर्न पर भारी ध्यान
- अमीर खुसरो द्वारा विकसित; बाद में गुरु गोबिंद सिंह
- तेज गति गायन में विशेषज्ञता आवश्यक
- पंडित रतन मोहन शर्मा : विश्व के सबसे तेज तराना गायक
उप-शास्त्रीय शैलियां
ठुमरी:
- "भारतीय शास्त्रीय संगीत का गीत"
- रोमांटिक/भक्तिपूर्ण विषय (राधा-कृष्ण कथाएं)
- ब्रज भाषा में रचनाएं
- घराने: बनारस, लखनऊ, पटियाला
- प्रसिद्ध: बेगम अख्तर
ठप्पा:
- उत्तर-पश्चिम भारतीय ऊंट सवारों के गीतों से व्युत्पन्न
- मुहम्मद शाह के मुगल दरबार में प्रस्तुत
- कलाकार: मियां सोदी, पंडित लक्ष्मण राव
गजल:
- प्रेम, हानि, वियोग व्यक्त करने वाला काव्य रूप
- ईरान में उत्पन्न (10वीं शताब्दी); सूफी रहस्यवादियों के साथ पनपा
- कवि: रूमी, अमीर खुसरो, मिर्जा गालिब, मुहम्मद इकबाल
कर्नाटक संगीत (दक्षिण भारत)
मुख्य विशेषताएं
- संस्कृत "कर्णाटक संगीतम" (पारंपरिक/संहिताबद्ध संगीत) से शब्द
- रागम (स्वर ढांचा) और तालम (लय चक्र) पर आधारित
- तमिलनाडु, केरल, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक में प्रचलित
सात स्वर (सप्त स्वर):
- सा (षड्जम), रि (ऋषभम), ग (गांधारम), म (मध्यमम)
- प (पंचमम), ध (धैवतम), नि (निषादम)
प्रमुख अवधारणाएं:
- श्रुति : सबसे छोटा पहचानने योग्य स्वर अंतराल; कुल 22 श्रुतियां
- गमक : स्वर के दोलन/अलंकरण; आज 10 प्रकार
- मेलकर्ता प्रणाली : 72 मेलकर्ता (वेंकटमखी)
- मुख्य रूप से आशुरचना क्षमता के साथ स्वरात्मक
संगीत रूप
- गीतम : सरल, मधुर राग रचना
- सुलादी : विभिन्न खंडों में विभिन्न तालों के साथ तालमालिका
- स्वरजाति : पल्लवी, अनुपल्लवी, चरणम; भक्ति/वीरता विषय
- जतिस्वरम : जति पैटर्न के साथ लयात्मक उत्कृष्टता
- वर्णम : स्वर पैटर्न को गूंथने वाला अनूठा रूप
- कीर्तनम : भक्ति सामग्री (भक्ति भाव) पर ध्यान
- कृति : कीर्तनम का विकसित, परिष्कृत रूप
- पल्लवी : आशुरचना की अनुमति देने वाला रचनात्मक रूप
कर्नाटक संगीत की त्रयी
पुरंदरदास (1484-1564):
- कर्नाटक संगीत के पिता
- विजयनगर के रहस्यवादी और संगीतकार
त्रयी:
- त्यागराज (1767-1847) : 1000 से अधिक कृतियां; कर्नाटक संगीत की आधारशिला
- श्याम शास्त्री (1763-1827) : विद्वत्तापूर्ण रचनाएं; दुर्लभ राग; देवी कामाक्षी
- मुत्तुस्वामी दीक्षितर (1775-1835) : विद्वत्तापूर्ण कृतियां; भारतीय दर्शन और संगीत का संयोजन
लोक संगीत
सामान्य विशेषताएं
- सांस्कृतिक विविधता : प्रत्येक क्षेत्र की अनूठी शैली, वाद्य, विषय
- सरल और प्रत्यक्ष : आसान धुनें और लय; दैनिक जीवन विषय
- समुदाय-उन्मुख : एकता को बढ़ावा देने वाली सामुदायिक गतिविधि
- मौखिक परंपरा : पीढ़ियों से मौखिक रूप से प्रसारित
- लयात्मक सरलता : दोहराव, अनुसरण में आसान
- स्थानीय वाद्य : ढोलक, सारंगी, एकतारा, बांसुरी
- आशुरचना : प्रत्येक प्रदर्शन अनूठा
- अनुष्ठानों में भूमिका : धार्मिक समारोह, फसल उत्सव, विवाह
- भावनात्मक अभिव्यक्ति : खुशी, दुख, आशा, निराशा
- नृत्य एकीकरण : लोक नृत्य से निकट संबंध
क्षेत्रीय लोक संगीत
| क्षेत्र | शैली | विशेषताएं |
|---|---|---|
| उत्तर प्रदेश | रसिया गीत, आल्हा, होरी, सोहर, कजरी | कृष्ण की लीलाएं; वीरता के गाथा; होली उत्सव |
| राजस्थान | पंखिड़ा, लोटिया, तीज गीत | खेत के गीत; त्योहार के गीत; शिव-पार्वती मिलन |
| छत्तीसगढ़ | पंडवानी | महाभारत की गाथाएं; शक्तिशाली गायन और हाव-भाव |
| गोवा | मांडो | प्रेम, त्रासदी, पुर्तगाली शासन के दौरान राजनीतिक प्रतिरोध |
| जम्मू-कश्मीर | चक्री, भाखा | नूट और रबाब के साथ समूह गीत; फसल के गीत |
| महाराष्ट्र | पोवाड़ा | शिवाजी जैसे नायकों की प्रशंसा करने वाली मराठी गाथाएं |
| आंध्र प्रदेश | बुर्राकथा | बोतल-आकार ड्रम के साथ नाटकीय गाथा |
| केरल | भूत गीत | अनुष्ठानिक; दुष्ट आत्माओं को भगाता है |
| ओडिशा | दासकठिया | काठी (लकड़ी के थपथपाने) का उपयोग करने वाली गाथा |
| असम | बिहू गीत | नव वर्ष उत्सव; प्रजनन विषय |
| तमिलनाडु | विल्लू पट्टू | मुख्य गायक धनुष-आकार वाद्य बजाता है; धार्मिक विषय |
महत्व
सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक महत्व
- सामाजिक एवं सांस्कृतिक अंतर्दृष्टि : दैनिक जीवन, परंपराओं, सामाजिक मानदंडों को दर्शाता है
- धार्मिक दस्तावेजीकरण : पवित्र ग्रंथ, भजन, मंदिर परंपराएं
- राजनीतिक प्रभाव : शाही संरक्षण ने संगीत परंपराओं को आकार दिया
- संस्कृतियों का संलयन : फारसी, इस्लामी, पश्चिमी एकीकरण
- आध्यात्मिक अभिव्यक्ति : भक्ति और सूफी परंपराएं
- विरासत का संरक्षण : पीढ़ियों से मौखिक परंपराएं बनी रहीं
- वैश्विक मान्यता : योग, वेदांत, शास्त्रीय संगीत विश्व स्तर पर प्रशंसित