पर्यावरणीय भूगोल
मानव और प्राकृतिक पर्यावरण के बीच अंतःक्रियाओं, प्रभावों और सतत समाधानों की खोज पर केंद्रित।
पर्वतीय पारिस्थितिकी तंत्र एवं पर्यटन
PYQ 2015: हिमालयी राज्यों की पारिस्थितिक वहन क्षमता
संदर्भ: जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड भारी पर्यटन आकर्षित कर रहे हैं लेकिन पारिस्थितिक वहन क्षमता तक पहुंच रहे हैं
- वहन क्षमता = अधिकतम जनसंख्या आकार जिसे पारिस्थितिकी तंत्र अनिश्चित काल तक बनाए रख सकता है
- पर्वत सबसे लचीले फिर भी निवासी सबसे कमजोर
पर्वतीय पारिस्थितिकी तंत्र पर प्रभाव:
अवसंरचना विकास:
- खड़ी ढलानों पर निर्माण गतिविधियां → भूकंप जोखिम
- अव्यवस्थित शहरीकरण द्वारा डल झील का अतिक्रमण
- सड़कों और पुलों का विकास (उत्तराखंड धार्मिक स्थल)
वायु प्रदूषण:
- वाहन यातायात → बर्फ का पीलापन, वायु प्रदूषण
- ग्लेशियरों, प्राकृतिक झरनों को प्रभावित करता है
- भीड़भाड़, दुर्घटनाएं (इसी कारण भूटान BBIN का विरोध करता है)
भूमि क्षरण:
- वनोन्मूलन + भूमि उपयोग परिवर्तन → भूस्खलन, बाढ़
- गैर-जिम्मेदार पर्यटक → कचरा फेंकना, प्लास्टिक
- पर्यटक खाना पकाने के लिए जलाऊ लकड़ी → बढ़ी मांग
जैव विविधता हानि:
- परागणकर्ता पक्षियों में भारी कमी
- गैर-देशी प्रजातियों का आक्रमण (असामान्य ऊंचाइयों पर काली चील, कबूतर)
हिमनद प्रभाव:
- कम अल्बेडो के कारण तेजी से पिघलना
- ईंधन जलाने से काला कार्बन प्रमुख योगदानकर्ता
जल प्रदूषण:
- नदियों पर बांध निर्माण
- नदी प्रदूषण
क्षेत्रीय वितरण:
- हिमाचल प्रदेश: पर्यटन कुल्लू, शिमला, धर्मशाला में केंद्रित (अन्य क्षेत्रों में <5%)
- जम्मू-कश्मीर: लद्दाख, श्रीनगर, जम्मू तक सीमित
- उत्तराखंड: मुख्यतः पश्चिमी भाग (बद्रीनाथ, केदारनाथ, हरिद्वार, ऋषिकेश)
आगे का मार्ग:
- वहन क्षमता के अनुसार पर्यटक संख्या नियंत्रित करें
- सामूहिक पर्यटकों के लिए निर्धारित शिविर स्थल
- पर्यावरणीय जागरूकता के लिए स्थानीय गाइड
- पर्यटन डेटा का उपयोग कर गंतव्य-विशिष्ट नीतियां
- इको-पर्यटन को बढ़ावा दें
- वाहन सीमाएं
- उच्च बांधों के बजाय रन-ऑफ-रिवर जल विद्युत परियोजनाएं
- पारिस्थितिकी सेवाओं के लिए भुगतान (पालमपुर हिमाचल प्रदेश मॉडल)
- क्षेत्रीय एकीकरण (विश्व बैंक सिफारिश)
- संरक्षण में महिलाओं की भूमिका (अक्सर प्रवास के बाद पीछे छूट जाती हैं)
PYQ 2021: 2021 के ज्वालामुखी विस्फोट और क्षेत्रीय पर्यावरण प्रभाव
2021 के प्रमुख ज्वालामुखी विस्फोट:
- सेमेरू ज्वालामुखी (इंडोनेशिया)
- माउंट स्ट्रोम्बोली (इटली)
- माउंट एटना (इटली)
- ला पाल्मा (कैनरी द्वीप समूह)
- आइसलैंड ज्वालामुखी
क्षेत्रीय पर्यावरण पर प्रभाव:
- अर्थव्यवस्था → पर्यटन, यात्रा, एयरलाइन यातायात ठप
- वनस्पति → पत्तियों पर राख जमाव → प्रकाश संश्लेषण प्रभावित → पौधों का नुकसान
- जलवायु → भारी CO₂ उत्सर्जन → GHG ताप
- शीतलन प्रभाव → SO₂ जल वाष्प के साथ मिलती है → एरोसोल → शीतलन
- अम्लीय वर्षा → कणों की रिहाई से तत्काल प्रभाव
- बिजली → धूल कण घर्षण → ज्वालामुखी बिजली
- स्थानीय समुदाय → विस्थापन, स्वास्थ्य खतरे
आगे का मार्ग:
- जोनेशन दृष्टिकोण
- निकासी योजना
- भवन सुदृढ़ीकरण
आर्कटिक बनाम अंटार्कटिक पिघलना
PYQ 2021: आर्कटिक बनाम अंटार्कटिक पिघलने के प्रभाव
मुख्य अंतर:
| विशेषता | आर्कटिक | अंटार्कटिक |
|---|---|---|
| प्रकार | जल निकाय पर बर्फ की चादर | ग्लेशियरों वाला महाद्वीप |
| बर्फ की मोटाई | 10 फीट तक | 9000 फीट तक |
| तापमान | ठंडा | और ठंडा |
| मानव निवास | कुछ (इनुइट) | न्यूनतम |
| पिघलने का महत्व | अधिक महत्वपूर्ण | कम तत्काल |
मौसम पैटर्न पर प्रभाव:
- जेट स्ट्रीम धीमी होना → ध्रुवीय क्षेत्रों में उच्च दबाव कमजोर होता है
- मध्य-अक्षांश वर्षा → वर्षण में वृद्धि
- हवा की दिशा उलटाव → परिसंचरण पैटर्न में परिवर्तन
- AMOC धीमा होना → जल ठहराव → लंबे समय तक गर्मी → अधिक चक्रवात/तूफान
- अंटार्कटिक परिध्रुवीय धारा (ACC) → हिमनद पिघलने से प्रभावित
- तूफान चालक → विश्व स्तर पर बदले पैटर्न
मानव गतिविधियों पर प्रभाव:
- मत्स्य पालन → प्रवास पैटर्न बाधित
- अभियान → स्वतंत्र रूप से बहते हिमखंड = खतरा
- तटीय समुदाय → समुद्र स्तर वृद्धि से खतरे में
- खाद्य फसलें → बदले मौसम से नुकसान
- खारे पानी का घुसपैठ → भूजल संदूषण
IPCC भविष्यवाणी: 2050 तक आर्कटिक कम से कम एक बार बर्फ-मुक्त स्थितियों का साक्षी बन सकता है
मृदा क्षरण
मृदा क्षरण: प्रकार, कारण एवं शमन
संदर्भ: भारत में 147 मिलियन हेक्टेयर क्षयित (IIRS 2015); ₹6800 करोड़ वार्षिक हानि (NRSA)
मृदा निर्माण को नियंत्रित करने वाले कारक:
- मूल सामग्री, स्थलाकृति (ढलान एक्सपोज़र, जल निकासी)
- वर्षण, तापमान (उष्णकटिबंधीय = गहरी प्रोफाइल)
- जैविक गतिविधि (राइजोबियम नाइट्रोजन स्थिर करता है)
- समय (परिपक्वता निर्धारित करता है)
मृदा क्षरण के प्रकार:
जल क्षरण:
- परत क्षरण → बड़े क्षेत्र से पतली परत हटाई जाती है
- रिल क्षरण → उंगली के आकार की संरचनाएं
- गली क्षरण → रिलों का संगम (चंबल बीहड़)
पवन क्षरण:
- लवणीकरण → शुष्क क्षेत्र, पानी वाष्पित होकर लवण छोड़ता है
- निलंबन → सबसे छोटे कण लंबी दूरी तक उड़ते हैं
अन्य प्रकार:
- भूस्खलन/पर्ची क्षरण → भारी बारिश से हाइड्रोलिक दबाव
- वनोन्मूलन → मिट्टी को हवा/पानी के संपर्क में लाता है
- अति-चराई → चारागाहों, जंगलों, पहाड़ों को नष्ट करती है
- दोषपूर्ण कृषि → अति-सिंचाई, झूम खेती
मृदा क्षरण के प्रभाव:
- कृषि उत्पादन में कमी → भूख, गरीबी
- खड्ड स्थलाकृति (चंबल) → बंजर भूमि
- ऊपरी परत का जैविक पदार्थ खो जाता है → जल धारण क्षमता में कमी
- भूजल स्तर गिरना, मृदा नमी में कमी
- वनस्पति सूखना, शुष्क भूमि का विस्तार
- सूखे और बाढ़ में वृद्धि
- भूस्खलन की पुनरावृत्ति
शमन उपाय:
- मल्चिंग → जैविक पदार्थ नंगी जमीन को ढकता है → नमी बनाए रखता है
- शून्य/सावधान जुताई → ऊपरी मिट्टी संरक्षित करता है
- समोच्च बाधाएं/जुताई → सतही अपवाह कम करता है
- सीढ़ीदार खेती → ढलान क्षरण नियंत्रित करता है
- अंतर-फसल → विभिन्न फसलें बारिश से धुलाई से बचाती हैं
- शेल्टर बेल्ट → वृक्ष पंक्तियां हवा की गति रोकती हैं (पश्चिमी भारत रेत टीला स्थिरीकरण)
- पट्टी खेती → घास की पट्टियां हवा का बल तोड़ती हैं
- वनीकरण → पेड़ों की जड़ें मिट्टी बांधती हैं
- अति-चराई रोकें → ऊपरी मिट्टी हानि रोकती है
- सूक्ष्म सिंचाई → छिड़काव क्षरण कम करता है
सरकारी पहलें:
- वन महोत्सव
- मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना
समुद्री पर्यावरण प्रभाव
मृत क्षेत्र और समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र
परिभाषा → कम-ऑक्सीजन (हाइपोक्सिक) क्षेत्र जहां जीव जीवित नहीं रह सकते
- उदाहरण: उत्तरी अमेरिका/दक्षिण अमेरिका के पश्चिमी तट, नामीबिया, भारत (अरब सागर), बंगाल की खाड़ी
- जलवायु परिवर्तन → समुद्री जीवन को खतरे में डालने वाला महासागर डीऑक्सीजनेशन
कारण:
- यूट्रोफिकेशन/शैवाल प्रस्फुटन → पोषक वृद्धि → शैवाल ऑक्सीजन खपत करता है
- कृषि अपवाह (उर्वरक, कीटनाशक)
- औद्योगिक उत्सर्जन, तेल रिसाव
- कन्वेयर बेल्ट मिश्रण पर जलवायु परिवर्तन प्रभाव
- महासागर/हवा धारा पैटर्न
परिणाम:
- मृत प्रजातियां, हानिकारक विषाक्तता
- प्रजातियों का प्रवास → नए शिकारियों का संपर्क
- मछलियों के लिए अदृश्य जाल → सुनने/देखने की क्षमता खोना
- प्रजनन समस्याएं (शुक्राणु/अंडा उत्पादन प्रभावित)
- नीली अर्थव्यवस्था प्रभाव → लाखों मछली पालन पर निर्भर
- प्रवाल भित्ति खतरे
आगे का मार्ग:
- बेहतर महासागर परिवहन नियमन
- सीवेज उपचार
- जलवायु परिवर्तन शमन
- जैविक खेती
- आर्द्रभूमि/बाढ़ मैदान संरक्षण
- शून्य तरल निर्वहन
- पोषक व्यापार (कार्बन व्यापार की तरह)
प्रवाल भित्ति संरक्षण
महत्व:
- 25% समुद्री जैव विविधता का समर्थन
- $2.7 ट्रिलियन/वर्ष उत्पन्न करती है
- "महासागरों के वर्षावन" → कोरल त्रिकोण
- कार्बन स्क्रबर (NASA)
- तटीय सुरक्षा
संरक्षण उपाय:
- ZSI बायो-रॉक तकनीक
- कोरल ब्लीचिंग अलर्ट सिस्टम (INCOIS)
- CRZ मानदंड
- अंतर्राष्ट्रीय कोरल रीफ पहल
- कोरल अस्तित्व के लिए मैंग्रोव संरक्षण
आगे का मार्ग ढांचा
पर्यावरणीय समाधानों के लिए PESTLE दृष्टिकोण
- राजनीतिक → अंतर्राष्ट्रीय सहयोग (संधियां), कन्वेंशन प्रवर्तन
- आर्थिक → सतत सब्सिडी, अपशिष्ट प्रबंधन में निवेश
- सामाजिक → समुदाय जुड़ाव, पारंपरिक ज्ञान एकीकरण
- तकनीकी → निगरानी प्रणालियां, बहाली प्रौद्योगिकी
- कानूनी → प्रदूषण के खिलाफ मजबूत कानून, आर्द्रभूमि संरक्षण
- पर्यावरणीय → पारिस्थितिकी तंत्र बहाली, हानिकारक प्रथाओं को कम करना
उत्तरों के लिए मुख्य निष्कर्ष
- SDG 13 (जलवायु कार्रवाई), SDG 14 (जल के नीचे जीवन), SDG 15 (भूमि पर जीवन)
- संविधान के अनुच्छेद 48A एवं 51A(g)
- पारिस्थितिकी तंत्र बहाली के लिए दशक 2021-30
- 30x30 लक्ष्य (कुनमिंग-मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल)
- IPCC मूल्यांकन रिपोर्ट
- गाडगिल समिति सिफारिशें
पिछले वर्षों के प्रश्न
पर्यावरणीय भूगोल PYQs
| वर्ष | प्रश्न |
|---|---|
| 2021 | आर्कटिक बनाम अंटार्कटिक पिघलने के मौसम और मानव गतिविधियों पर प्रभाव |
| 2021 | वैश्विक ज्वालामुखी विस्फोट और क्षेत्रीय पर्यावरण प्रभाव |
| 2019 | प्रवाल जीवन प्रणाली पर ग्लोबल वार्मिंग का प्रभाव |
| 2018 | समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र पर मृत क्षेत्रों के परिणाम |
| 2015 | पर्यटन के कारण जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड पारिस्थितिक वहन क्षमता तक पहुंच रहे हैं |