भारत में उग्रवाद (Insurgency) - मेन्स
अवलोकन
पिछले वर्ष के प्रश्न (PYQs)
| वर्ष | प्रश्न |
|---|---|
| 2023 | आंतरिक सुरक्षा में 'हाइब्रिड आतंकवाद' की अवधारणा और इससे निपटने के उपायों पर चर्चा करें। |
| 2017 | भारत का पूर्वोत्तर क्षेत्र लंबे समय से उग्रवाद से ग्रस्त है। इस क्षेत्र में सशस्त्र उग्रवाद के बने रहने के प्रमुख कारणों का विश्लेषण करें। |
उत्तर-पूर्व भारत में उग्रवाद (अध्याय 3)
पूर्वोत्तर में उग्रवाद के कारक (Detailed Causes)
पूर्वोत्तर भारत में उग्रवाद के पीछे भौगोलिक, सामाजिक और राजनीतिक कारकों का एक जटिल मिश्रण है:
भौगोलिक और जनसांख्यिकीय कारक:
- जटिल स्थलाकृति: दुर्गम पहाड़ी क्षेत्र और घने जंगल उग्रवादियों को सुरक्षित पनाहगाह (Safe Havens) प्रदान करते हैं।
- छिद्रपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय सीमा: क्षेत्र की 99% सीमा अंतर्राष्ट्रीय है (म्यांमार, बांग्लादेश, चीन, भूटान), जिसका उपयोग घुसपैठ और तस्करी के लिए किया जाता है।
- अवैध प्रवासन: विशेषकर बांग्लादेश से होने वाले अवैध प्रवासन ने स्थानीय जनसांख्यिकी को बदल दिया है, जिससे 'पुत्र-की-मिट्टी' (Sons of the Soil) आंदोलनों को जन्म मिला।
सामाजिक-सांस्कृतिक कारक:
- जातीय अस्मिता का संघर्ष: विभिन्न जनजातीय समूहों के बीच अपनी विशिष्ट पहचान और स्वायत्तता को लेकर संघर्ष।
- विस्थापन: 1990 से 2011 के बीच जातीय हिंसा के कारण लगभग 8 लाख लोग विस्थापित हुए।
आर्थिक कारक:
- बुनियादी ढांचे का अभाव: मुख्य भूमि की तुलना में सड़क, रेल और बिजली की भारी कमी।
- बेरोजगारी: शिक्षा के प्रसार के बावजूद सम्मानजनक रोजगार के अवसरों की कमी ने युवाओं को उग्रवाद की ओर धकेला।
राजनीतिक एवं प्रशासनिक कारक:
- अलगाव का अहसास: नई दिल्ली से अत्यधिक भौगोलिक और राजनीतिक दूरी के कारण उपेक्षा की भावना।
- AFSPA का प्रभाव: सशस्त्र बल विशेषाधिकार अधिनियम (AFSPA) के लंबे समय तक उपयोग से स्थानीय आबादी में रोष।
- भ्रष्टाचार: विकास प्रसादों का जमीनी स्तर तक न पहुँचना।
बाहरी समर्थन (External Support):
- चीन और पाकिस्तान द्वारा विद्रोही समूहों (जैसे नागा और उल्फा) को प्रशिक्षण, आधुनिक हथियार और म्यांमार/बांग्लादेश में सुरक्षित ठिकाने उपलब्ध कराना।
राज्य-वार प्रमुख विद्रोही समूह (State-wise Detailed Groups)
- नागालैंड:
- NSCN-IM (इसाक-मुइवा): 'ग्रेटर नागालिम' की मांग करने वाला सबसे पुराना और शक्तिशाली समूह।
- NSCN-K (खापलांग): भारत-म्यांमार सीमा पर सक्रिय।
- मणिपुर:
- UNLF (United National Liberation Front): 1964 में गठित सबसे पुराना समूह।
- PLA (People's Liberation Army): घाटी आधारित विद्रोही समूह।
- वर्तमान: मैतेई (Valley) और कुकी (Hills) समुदायों के बीच जातीय संघर्ष सबसे बड़ी चुनौती।
- असम:
- ULFA (Independent): परेश बरुआ के नेतृत्व में अभी भी सक्रिय।
- NDFB (बोडो): अब अधिकांश गुटों ने आत्मसमर्पण कर दिया है।
- मिजोरम: MNF (Mizo National Front): 1986 के मिजोरम शांति समझौते के बाद मुख्यधारा में शामिल।
- त्रिपुरा: NLFT (National Liberation Front of Tripura): अभी भी छिटपुट घटनाओं में शामिल।
हालिया शांति समझौते और सरकारी प्रयास (Accords & Initiatives)
भारत सरकार ने 'वार्ता और विकास' की नीति के तहत कई ऐतिहासिक समझौते किए हैं:
प्रमुख शांति समझौते:
- बोडो शांति समझौता (2020): असम के बोडो क्षेत्रों में स्वायत्तता के विस्तार और हज़ारों उग्रवादियों के आत्मसमर्पण का मार्ग प्रशस्त किया।
- कार्बी आंगलोंग समझौता (2021): असम के इस क्षेत्र में दशकों पुराने विद्रोह को समाप्त कर 1000 करोड़ का विकास पैकेज दिया गया।
- डिमासा शांति समझौता (2023): DNLA के साथ समझौता कर क्षेत्र को उग्रवाद मुक्त बनाया गया।
- UNLF शांति समझौता (2023): मणिपुर के सबसे पुराने घाटी-आधारित समूह (पामबेई गुट) ने हिंसा का त्याग किया।
प्रमुख सरकारी पहलें:
- AFSPA में कटौती: सुरक्षा स्थिति में सुधार के कारण नागालैंड, असम और मणिपुर के बड़े हिस्सों से AFSPA हटाया गया।
- PM-DevINE योजना: पूर्वोत्तर के बुनियादी ढांचे और सामाजिक विकास के लिए प्रधानमंत्री की विशेष पहल।
- लुक/एक्ट ईस्ट नीति: म्यांमार और थाईलैंड के साथ कनेक्टिविटी (जैसे त्रिपक्षीय राजमार्ग) के माध्यम से आर्थिक विकास।
- S&R नीति: उग्रवादियों के लिए वित्तीय सहायता और कौशल विकास के माध्यम से आत्मसमर्पण और पुनर्वास।
जम्मू-कश्मीर में उग्रवाद (अध्याय 4)
अनुच्छेद 370 के निरसन के बाद का परिदृश्य (Post-370 Impact)
5 अगस्त 2019 को अनुच्छेद 370 के हटने के बाद जम्मू-कश्मीर की सुरक्षा और प्रशासनिक स्थिति में युगांतरकारी परिवर्तन आए हैं:
सुरक्षा स्थिति में सुधार (Security Data):
- पथराव (Stone Pelting): पत्थरबाजी की घटनाओं में लगभग 90% से अधिक की कमी आई है।
- आतंकी घटनाएं: आतंकी हमलों और नागरिक हताहतों की संख्या में ऐतिहासिक गिरावट दर्ज की गई है।
- घुसपैठ: सीमा पार से होने वाली घुसपैठ पर प्रभावी नियंत्रण।
प्रशासनिक और राजनीतिक बदलाव:
- त्रिस्तरीय पंचायती राज: पंचायत और जिला विकास परिषद (DDC) चुनावों के माध्यम से लोकतंत्र का जमीनी स्तर पर सुदृढ़ीकरण।
- भ्रष्टाचार पर प्रहार: भर्ती प्रक्रियाओं में पारदर्शिता और जवाबदेही में वृद्धि।
सामाजिक न्याय और समावेशन:
- समान अधिकार: दशकों से वंचित वाल्मीकि समुदाय, पश्चिमी पाकिस्तान के शरणार्थियों और महिलाओं को संपत्ति व सरकारी नौकरियों में समान अधिकार प्राप्त हुए।
आर्थिक विकास:
- पर्यटन में उछाल: 2022-23 में रिकॉर्ड तोड़ पर्यटकों का आगमन, जो शांति की बहाली का प्रतीक है।
- निवेश: जम्मू और श्रीनगर के लिए औद्योगिक निवेश के नए प्रस्ताव और AIIMS जैसे संस्थानों की स्थापना।
वर्तमान रुझान और उभरती चुनौतियाँ (Current Trends & TRF)
आतंकवाद का स्वरूप अब बदल रहा है, जो सुरक्षा बलों के लिए नई चुनौतियाँ पेश कर रहा है:
- हाइब्रिड आतंकवाद (Hybrid Terrorism): ये वे 'पार्ट-टाइम' कट्टरपंथी युवा होते हैं जिनका कोई पिछला आतंकी रिकॉर्ड नहीं होता। ये सामान्य नागरिक की तरह रहते हुए अचानक हमला कर गायब हो जाते हैं, जिससे इन्हें ट्रैक करना अत्यंत कठिन होता है।
- टीआरएफ (The Resistance Front - TRF): इसे लश्कर-ए-तैयबा (LeT) का एक मुखौटा संगठन माना जाता है। यह 'लक्षित हत्याओं' (Targeted Killings) के माध्यम से अल्पसंख्यकों, कश्मीरी पंडितों और गैर-स्थानीय श्रमिकों के बीच भय का वातावरण बना रहा है।
- ड्रोन तकनीक: सीमा पार से हथियारों, ड्रग्स और 'स्टिकी बम' (Sticky Bombs) की तस्करी के लिए ड्रोन का बढ़ता उपयोग।
सुरक्षा उपाय और सुधारात्मक पहलें (Security Measures)
- जीरो टॉलरेंस नीति: आतंकवाद और उसके वित्तपोषण (Terror Funding) के खिलाफ सरकार की कड़ी नीति।
- NIA की कार्रवाई: आतंकी नेटवर्कों और ओजीडब्ल्यू (OGW - Over Ground Workers) के खिलाफ छापेमारी और संपत्तियों की कुर्की।
- ऑपरेशन सद्भावना: भारतीय सेना द्वारा शिक्षा, स्वास्थ्य और कौशल विकास के माध्यम से "दिल और दिमाग जीतने" (Winning Hearts and Minds) की निरंतर पहल।
- ग्राम रक्षा समूह (VDGs): दूरदराज के इलाकों में सुरक्षा के लिए स्थानीय ग्रामीणों को प्रशिक्षण और हथियार प्रदान कर उन्हें सशक्त बनाना।
आगे की राह (Way Forward)
समाधान के लिए बहु-आयामी दृष्टिकोण
- राजनीतिक संवाद: सभी हितधारकों के साथ सतत बातचीत के माध्यम से वैध शिकायतों का समाधान।
- एक्ट ईस्ट नीति (Act East Policy): पूर्वोत्तर में बुनियादी ढांचे और व्यापार को बढ़ावा देकर आर्थिक एकीकरण सुनिश्चित करना।
- कट्टरपंथीकरण-विरोध (Counter-Radicalization): युवाओं को मुख्यधारा में जोड़ने के लिए रोजगार और शिक्षा के अवसर पैदा करना।
- सीमा प्रबंधन: म्यांमार और बांग्लादेश सीमा पर बाड़ लगाना और 'फ्री मूवमेंट रिजीम' (FMR) का तर्कसंगत उपयोग।
- सॉफ्ट पावर: सद्भावना जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से सुरक्षा बलों और जनता के बीच विश्वास का निर्माण।
मुख्य निष्कर्ष
भारत में उग्रवाद (चाहे वह पूर्वोत्तर हो या J&K) केवल एक सुरक्षा समस्या नहीं बल्कि एक 'सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक' मुद्दा है। सुरक्षा अभियानों के साथ-साथ समावेशी विकास, शासन में सुधार और युवाओं के सशक्तीकरण को मिलाकर ही स्थाई शांति प्राप्त की जा सकती है।